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समाजकारण /राजकारण

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जमनालाल बजाज...

 

             *जमनालाल बजाज*  

     (स्वतंत्रता सेनानी, उद्योगपती)

          *जन्म : 4 नवम्बर, 1889*

 (काशी का वास, सीकर, राजस्थान)

          *मृत्यु : 11 फ़रवरी, 1942*

            ( वर्धा, महाराष्ट्र)

पिता : कनीराम,                                      माता : बिरदीबाई

पत्नी : जानकी देवी बजाज

नागरिकता : भारतीय

प्रसिद्धि : स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उद्योगपति

विशेष योगदान : जमनालाल बजाज देश के प्रथम नेता थे, जिन्होंने वर्धा में अपने पूर्वजों के 'लक्ष्मीनारायण मंदिर' के द्वार 1928 में ही अछूतों के लिए खोल दिये थे।

अन्य जानकारी : जमनालाल जी ने देश के पशुधन की रक्षा का काम अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था। इस काम में वे इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोई मिसाल नहीं थी। उनका सबसे बड़ा काम गो-सेवा था।

               जमनालाल बजाज  स्वतंत्रता संग्राम सेनानी, उद्योगपति और मानवशास्त्री थे। वे महात्मा गाँधी के बहुत करीबी और उनके सच्चे अनुयायी थे। गाँधीजी उन्हें अपने पुत्र समान मानते थे। जमनालाल बजाज 1920 में कांग्रेस के कोषाध्यक्ष बने थे तथा इस पद पर वे जीवन भर रहे। उन्होंने वर्धा में ‘सत्याग्रह आश्रम’ की स्थापना की थी। इसके अलावा गौ सेवा संघ, गांधी सेवा संघ, सस्ता साहित्य मण्डल आदि संस्थाआं की स्थापना भी उनके द्वारा की गई। जमनालाल बजाज जाति भेद के विरोधी थे तथा उन्होंने हरिजन उत्थान के लिए भी प्रयत्न किया। उनकी स्मृति में सामाजिक क्षेत्रों में सराहनीय कार्य करने के लिये 'जमनालाल बजाज पुरस्कार' की स्थापना की गयी है।


💁🏻‍♂️ *परिचय*

जयपुर, राजस्थान के एक छोटे से गांव काशी का वास में गरीब कनीराम किसान के यहाँ जमनालाल बजाज का जन्म 4 नवम्बर, 1889 को हुआ था। वे वर्धा के एक बड़े सेठ बच्छराज के यहां पांच वर्ष की आयु में गोद लिये गये थे। सेठ वच्छराज सीकर के रहने वाले थे। उनके पूर्वज सवा सौ साल पहले नागपुर में आकर बस गये थे। विलासिता और ऐश्वर्य का वातावरण इस बालक को दूषित नहीं कर पाया, क्‍योंकि उनका झुकाव तो बचपन से अध्यात्म की ओर था। जमनालाल की सगाई दस वर्ष की अवस्था में हो गयी थी। तीन वर्ष बाद जब जमनालाल 13 वर्ष के हुए तथा जानकी 9 वर्ष की हुई, तो उनका विवाह धूमधाम से वर्धा में हुआ।


जमनालाल बजाज ने खादी और स्वदेशी अपनाया और अपने वेशकीमती वस्त्रों की होली जलाई। जमनालाल जी ने अपने बच्चों को किसी फैशनेबल पब्लिक स्कूल में नहीं भेजा, बल्कि उन्हें स्वेच्छापूर्वक वर्धा में आरम्भ किये गये विनोबा के सत्याग्रह आश्रम में भेजा। सन 1922 में अपनी पत्नी को लिखे एक पत्र में उन्होंने कहा कि- "मैं हमेशा से यही सोचता आया हूं कि तुम और हमारे बच्चे मेरे ही कारण किसी प्रकार की प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त न करें। यदि कोई प्रतिष्ठा अथवा पद प्राप्त हो, तो वह अपनी-अपनी योग्यता के बल पर हो। यह मेरे, तुम्हारे, उनके सबके हित में है।"


🎯 *महत्त्वपूर्ण कार्य*

अखिल भारतीय कोषाध्यक्ष की हैसियत से खादी के उत्पादन और उसकी बिक्री बढ़ाने के विचार से जमनालाल बजाज ने देश के दूर-दराज भागों का दौरा किया, ताकि अर्धबेरोजगारों को फायदा पहुंच सके। 1935 में गांधीजी ने 'अखिल भारतीय ग्रामोद्योग संघ' की स्थापना की। इस नये संघ के लिए जमनालाल बजाज ने बडी खुशी से अपना विशाल बगीचा सौंप दिया, जिसका नाम गांधीजी ने स्वर्गीय मगनलाल गांधी के नाम पर 'मगनाडी' रखा। 1936 में 'अखिल भारतीय हिंदी साहित्य सम्मेलन', नागपुर के बाद तुरंत ही जमनालाल जी ने वर्धा में देश के पश्चिम और पूर्व के प्रांतों में हिंदी प्रचार के लिए, 'राष्ट्रभाषा प्रचार समिति' की स्थापना की तथा उसके लिए राशि इकट्ठा की। इसके कुछ ही समय बाद वह 'हिन्दी साहित्य सम्मेलन', मद्रास के अध्यक्ष चुने गये। अपने इस पद का उपयोग उन्होंने राष्ट्रभाषा आंदोलन को व्यवस्थित रूप देने की दिशा में किया। जमनालाल जी इसके अतिरिक्‍त मन, प्राण से हिन्दू-मुस्लिम एकता और अछूतोद्धार के काम में जुट गये। वास्तव में वे देश के प्रथम नेता थे, जिन्होंने वर्धा में अपने पूर्वजों के 'लक्ष्मीनारायण मंदिर' के द्वार 1928 में ही अछूतों के लिए खोल दिये थे। जमनालाल बजाज और उनकी पत्नी जानकी देवी अतिथियों की पसंद का बहुत खयाल रखते थे।


🏵️ *त्याग की दृष्टि से* जमनालाल बजाज का अंतिम कार्य सर्वश्रेष्ठ रहा। देश के पशुधन की रक्षा का काम उन्होंने अपने लिए चुना था और गाय को उसका प्रतीक माना था। इस काम में वे इतनी एकाग्रता और लगन के साथ जुट गये थे कि जिसकी कोई मिसाल नहीं थी। उनका सबसे बड़ा काम गो-सेवा का था। वैसे तो यह काम पहले भी चलता था, लेकिन धीमी चाल से। इससे उन्हें संतोष न था। उन्होंने इसे तीव्र गति से चलाना चाहा और इतनी तीव्रता से चलाया कि खुद ही चल बसे। अगर हमें गाय को जिंदा रखना है तो हमें भी उसकी सेवा में अपने प्राण खोने होंगे। जमनालाल जी कार्यकर्ताओं को केवल आर्थिक सहायता ही नहीं देते थे, वह उनके बच्चों की शिक्षा का भी प्रबंध करते थे। बीमार पड जाने पर उनकी चिकित्सा भी करवाते थे। वह ऐसे लोगों के बच्चों की सूची भी रखते थे और उनकी शादी बहुत कम खर्च में करवा देते थे। इसी कारण गांधीजी उन्हें स्नेह से "शादी काका" भी कहते थे।


🏅 *'राय बहादुर' की पदवी*

सन् 1918 में सरकार ने जमनालाल बजाज को 'राय बहादुर' की पदवी से अलंकृत किया। इसके लिए जब जमनालाल बजाज ने गांधीजी से सलाह मांगी तो उन्होंने कहा- "नये सम्मान का सदुपयोग करो। सम्मान और पदवी इत्यादि खतरनाक चीजे हैं। उनका सदुपयोग की जगह दुरुपयोग अधिक हुआ है। मैं चाहूंगा कि तुम उसका सदुपयोग करो। यह तुम्हारी देशभक्ति या आध्यात्मिक उन्नति के आडे नहीं आयेगा।" 1920 में कलकत्ता अधिवेशन में असहयोग का प्रस्ताव पारित हुआ, तो जमनालाल जी ने अपनी पदवी लौटा दी।


🌀 *जयपुर सत्याग्रह*

1931 में जमनालाल जी के प्रयत्नों के कारण 'जयपुर राज्य प्रजा मंडल' की स्थापना हुई। 1936 में यह मंडल सक्रिय रूप से काम करने लगा। 30 मार्च, 1938 को जयपुर राज्य ने अचानक एक आदेश निकाल दिया कि सरकार की आज्ञा के बिना जयपुर राज्य में किसी भी सार्वजनिक संस्था की स्थापना नहीं की जा सकेगी। इस आदेश का मुख्य निशाना प्रजा मंडल की गतिविधियों को व्यर्थ करना था। मंडल का वार्षिक अधिवेशन 8 मई व 9 मई को जमनालाल जी की अध्यक्षता में घोषित किया जा चुका था। उन दिनों जयपुर के एक अंग्रेज़ दीवान बीकैम्प सेंटजान को जमनालाल की लोकप्रियता पसंद नहीं थी। 4 जुलाई, 1938 को बात बहुत बढ़ गयी और जयपुर पुलिस ने एक रेलगाड़ी पर गोलियां चला दी। जिसमें अनेक राजपूत मरे और घायल हुए। सीकर के राजपूत और जाट भड़क उठे और लगा कि खून की नदियां बहने लगेंगी। जब जमनालाल बजाज ने इस शर्मनाक परिस्थिति का समाचार सुना तो उन्होंने चाहा कि दोनों में सुलह हो जाये। सीकर जमनालाल जी का जन्म स्थान था। उन्होंने हिंसा के बजाय लोगों को अहिंसक बने रहने की सलाह दी। 30 दिसम्बर, 1938 को जयपुर राज्य में फैले हुए अकाल का लेखा-जोखा करने तथा राहत कार्य करने के लिए जमनालालजी सवाई माधोपुर स्टेशन पर दूसरी गाड़ी का इंतजार कर रहे थे। इतने में इंस्पेक्‍टर जनरल ऑफ पुलिस एफ. एस. यंग ने उनको एक आदेश दिया, जिसमें यह लिखा हुआ था कि रियासत में उनके प्रवेश और गतिविधियों के कारण शांति भंग होने का खतरा है। इसलिए वे रियासत की सीमा में प्रवेश नहीं कर सकते। किन्तु इस निेषेधाज्ञा ने प्रजा मंडल की आँखें खोल दीं। इसके कारण जमनालाल जी के नेतृत्व में सत्याग्रह किया गया। अंत में जयपुर रियासत को अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ी। इसमें कोई संदेह नहीं कि जमनालाल बजाज रियासतों में रहने वाली प्रजा के अधिकारों के सच्चे संरक्षक थे और वह अपने जीवन के अंत तक देशी राज्यों में नागरिक स्वतंत्रता के लिए अनथक संघर्ष करते रहे।


🪔 *मृत्यु*

1941 के व्यक्तिगत सत्याग्रह में जेल से रिहार्इ के बाद जमनालाल जी महात्मा गाँधी की सहमति से आनंदमयी मां से मिलने और अपनी आध्यात्मिक महत्त्वाकांक्षा को संतुष्ट करने का उपाय जानने की दृष्टि से देहरादून गये। राजपुर आश्रम में मां से मिलने के बाद जमनालाल जी ने गांधीजी को एक पत्र लिखा-


"मेरा शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य बहुत अच्छा है। मुझे स्वाभाविक जीवन जीने का यहां अवसर प्राप्त हुआ है। मुझे मां का स्नेह भी इस सीमा तक प्राप्त हो रहा है कि मुझे इससे संतुष्टि प्राप्त होती है। मां अहिंसा और प्रेम की जीती-जागती मूर्ति ही हैं। वातावरण भी मौन और कीर्तन का है। मां निरक्षर हैं, किन्तु कठिन से कठिन विषयों को बड़ी स्पष्टता के साथ समझती है और सदा आनंदमयी बनी रहती हैं।"


कहा जाता है कि यद्यपि मां विवाहित हैं, किन्तु जीवनभर ब्रह्मचारिणी रहीं। सत्य के प्रति उनका बड़ा आग्रह है। यहां जीवन बहुत सीधा-साधा है। आनंदमयी मां के आश्रम का वातावरण पवित्र और प्रेमपूर्ण है। मेरा मन यहां कुछ और दिन ठहरने का होता है। पिता की तरह मुझे बापू और मां आनंदमयी के रूप में मुझे माता मिल गयीं। वर्धा लौटने के बाद मस्तिष्क की नस फट जाने के कारण 11 फ़रवरी, 1942 में जमनालाल जी का एकाएक देहावसान हो गया।


♦️ *जमनालाल जी के नियम*

▪️किसी भी काग़ज़ पर बिना पढ़े हस्ताक्षर मत करो।

▪️इस उम्मीद में कहीं भी धन नहीं लगाना चाहिए कि केवल फायदा होगा।

▪️नहीं कहने में आगा-पीछा नहीं करना चाहिए।                                          ▪️हरेक व्यक्ति जो सफल होना चाहता है, उसमें दूसरों को अपने वक्‍तव्य पर राजी करने की ताकत होनी चाहिए।

▪️अपरिचितों से सावधान रहो। इसका अर्थ यह नहीं कि उनसे संदेह का व्यवहार करो।

▪️व्यापार का हिसाब-किताब साफ-सुथरा और सच्चा होना चाहिए। हर चीज हिसाब से होनी चाहिए।

▪️किसी व्यक्ति की जमानत लेने से पहले उसके बारे में सब कुछ जान लो।

▪️पाई-पाई का हिसाब रखो।

▪️समय के बिलकुल पाबंद रहो और यदि किसी को किसी काम के लिए निश्चित समय दिया है तो उस पर दृढ़ता से पालन करो।

▪️तुम सचमुच जितना कर सकते हो, उससे अधिक करने की किसी को आशा मत बधाओं।

▪️ईमानदारी के साथ चलो, किन्तु इसलिए नहीं कि तदनुसार चलने से लाभ होता है।

▪️जो करना चाहते हो आज ही कर डालो।

▪️केवल सफलता का ही विचार करो, सफलता की ही बात करो और तुम देखोगे कि तुम सफल हो गये हो।

▪️अपने शरीर और आत्मा की शक्ति पर विश्वास करो।

▪️कठिन श्रम करने में शर्म की कोई बात नहीं है।

साफ बात कहने में कभी नहीं हिचकिचाना चाहिए।

      

            

पेरियार ई.व्ही. रामसामी नायकर..



   *पेरियार ई.व्ही. रामसामी नायकर*

         (तमीळ समाजसुधारक)


      *जन्म : १७ सप्टेंबर १८७९*

        (जन्मस्थळ : ईरोड)

     *मृत्यूची तारीख: २४ डिसेंबर, १९७३*

                 (वेल्लोर)

     *दफन केले: २५ डिसेंबर १९७३,* 

     पेरियार मेमोरियल, चेन्नई

पक्ष: जस्टीस पार्टी

      पेरियार इरोड वेंकट नायकर रामसामी  हे विज्ञान बोध आणि तर्क विषयाचे क्रांतीकारी विचारक होते. त्यांनी समाजातील अस्पृश्य, पीडित, व्यक्तींना सन्मानाने जगण्याचा व समान अधिकार मिळाविण्याचा मार्ग दाखवला. पेरियार एकमेव असे क्रांतीकारक होते की त्यांनी दक्षिण भारतातील राजकारणामधुन ब्राम्हणवादाला सुरूंग लावला आणि समाज व्यवस्था बळकट केली तसेच तमिळनाडूच्या राजकारणात ब्राह्मणेत्तर समाजाला वर्तमान इतिहासातील राजकारणात बरोबरीने बसवले. तामिळनाडू राज्यात आज पण पेरियार रामसामी यांच्या विचारांचा प्रभाव दिसून येतो. पेरियार यांनी तत्कालीन मद्रास प्रांतात जस्टीस पार्टीची स्थापना केली.

♨️ *काशी येथिल प्रसंग*

सन 1904 मध्ये पेरियार यांनी काशीला भेट दिली.ज्याने त्यांचं आयुष्य फार बदलून गेलं. भूक लागल्यावर ते तेथील निःशुल्क भोजनाची व्यवस्था करण्यात आलेल्या कक्षात गेले. तिथे गेल्यावर त्यांना समजलं की, ते भोजन फक्त ब्राह्मणांसाठी आहे. परंतु त्यांनी भोजन मिळविण्यासाठी खुप प्रयत्न केला. पण ब्राह्मणांनी त्यांना धक्के देऊन बाहेर काढलं, त्यांना अपमानित केलं. ज्यामुळं ते रूढीवादी हिंदुत्वाचे कट्टर विरोधी बनले. त्यानंतर त्यांनी कोणत्याही धर्माचा स्वीकार नाही केला, आणि त्यामुळे ते आजीवन नास्तिक राहीले.

⛲ *वायकोम सत्याग्रह*

केरळ आणि उर्वरित भारतातील प्रचलित जातीव्यवस्थेनुसार, निम्न जातीच्या हिंदूंना मंदिरात प्रवेश नाकारला गेला. केरळमध्ये, त्यांना मंदिरांकडे जाणा-या रस्त्यांवर चालण्याची परवानगी नाकारण्यात आली. (1956 मध्ये केरळ राज्याची स्थापना झाली; पूर्वी हे मलबार (उत्तर केरळ), कोचीन आणि त्रावणकोर राज्यांमध्ये व्यापकपणे विभागले गेले होते). 1923  मध्ये काँग्रेस पक्षाच्या काकीनाडा बैठकीत के. के. माधवन यांनी केरळमधील निराश जातींमधील भेदभाव दर्शविणारा अहवाल सादर केला. त्या सत्राने अस्पृश्यतेविरूद्धच्या हालचालींना प्रोत्साहन देण्याचा निर्णय घेतला. केरळमध्ये या प्रदेशात अस्पृश्यतेच्या विरोधात लढा देण्यासाठी वेगवेगळ्या जातींच्या लोकांची समिती बनविली गेली. के केल्पन यांच्या अध्यक्षतेखाली समिती होती; बाकीचे सदस्य टीके माधवन, वलयुधा मेनन, कुरुर नीलाकांतन नंबूदिरीपाद आणि टीआर कृष्णस्वामी अय्यर होते.  मार्च 1924 रोजी या चळवळीस प्रारंभ झाला. वैकोम महादेव मंदिराच्या बाहेरील बाजूस एक बोर्ड होता ज्यामध्ये अवतार (निम्न जाती) प्रवेश करण्यास मनाई होती. सत्याग्रही तिघांच्या तुकड्यात मंदिरात प्रवेश करण्यासाठी गेले. पोलिसांनी त्यांचा प्रतिकार केला आणि त्यांना अटक केली. गांधीजी, चटंपी स्वामीकल आणि श्री नारायण गुरू यांनी या आंदोलनाला पाठिंबा दर्शविला. या चळवळीला अखिल भारतीयत्व प्राप्त झाले आणि दूरदूर पासून पाठिंबा मिळाला. सत्याग्रह्यांना अन्न पुरवण्यासाठी स्वयंपाकघर बसवून पंजाबचे अकाल लोक पाठिंबा देतात. ख्रिश्चन आणि मुस्लिम नेते देखील समर्थनासाठी पुढे आले. गांधीजींनी हे आंदोलन रद्दबातल केले पाहिजे. गांधीजींच्या सल्ल्यानुसार एप्रिल 1924 मध्ये हे आंदोलन तात्पुरते मागे घेण्यात आले. जाती-हिंदूंशी चर्चा अयशस्वी झाल्यानंतर नेत्यांनी आंदोलन पुन्हा सुरू केले. नेते टीके माधवन आणि केपी केसावा मेनन यांना अटक करण्यात आली. आपला पाठिंबा देण्यासाठी इ.व्ही. रामास्वामी (पेरियार) तामिळनाडूहून आले होते. त्यांना अटक करण्यात आली.  ऑक्टोबर 1924 रोजी सवर्णांच्या समूहाने (अग्रेषित जातींनी) मिरवणुकीत मोर्चा काढला आणि मंदिरात प्रवेश करण्यासाठी त्रावणकोरच्या रीजेंट महारानी सेतुलक्ष्मीबाई यांच्याकडे एक निवेदन सादर केले. गांधीजींनी एजंट महारानींशीही भेट घेतली. सवर्णांच्या या मिरवणुकीचे नेतृत्व मन्नाथ पद्मनाभन नायर यांनी केले. नोव्हेंबर 1924 मध्ये जेव्हा मिरवणूक तिरुअनंतपुरम येथे पोहोचली तेव्हा वैकोम येथे सुमारे कांसह ही संख्या जवळपास पर्यंत वाढली.

फेब्रुवारी 1924मध्ये त्यांनी मंदिरात प्रवेश मिळवण्यासाठी 'केरळपर्यतनम' सुरू करण्याचा निर्णय घेतला आणि जाती-धर्माची पर्वा न करता प्रत्येक हिंदूंसाठी सार्वजनिक रस्ते वापरण्याचा अधिकारही त्यांनी घेतला. त्यानंतर केरळ राज्यातील त्रावणकोरमधील छोटेसे शहर वैकोममध्ये मंदिर परिसरात व त्याच्या आसपास अस्पृश्यतेचे कठोर कायदे होते. दलितांना , ज्यांना हरिजन म्हणूनही ओळखले जाते, त्यांना आजूबाजूच्या जवळच्या रस्त्यावर प्रवेश करण्याची परवानगी नव्हती आणि मंदिरात जाण्यापर्यंत आत जाऊ दिले नाही. जातीविरोधी भावना वाढत होती आणि 1924 मध्ये वैकोम यांना संघटित सत्याग्रहासाठी योग्य जागा म्हणून निवडले गेले . त्यांच्या मार्गदर्शनाखाली सर्व जातींना मंदिरात प्रवेश मिळावा या उद्देशाने यापूर्वीच एक चळवळ सुरू झाली होती. अशा प्रकारे आंदोलन आणि निदर्शने झाली. 14 एप्रिल रोजी पेरियार आणि त्यांची पत्नी नगम्म वायकॉम येथे दाखल झाले. त्यांना त्वरित अटक करण्यात आली आणि सहभागासाठी तुरुंगात टाकले गेले. गांधींनी गैर-केरळवादी आणि बिगर-हिंदूंनी भाग घेण्यास आक्षेप घेतल्यानंतरही पेरियार आणि त्यांचे अनुयायी आंदोलन मागे न घेईपर्यंत या आंदोलनाला पाठिंबा देत राहिले. सत्याग्रहात भाग घेतलेल्या त्याच्या अनुयायांनी त्यांना दिलेली वैकोम वीरान ही पदवी त्यांना मिळाली. वैकोम सत्याग्रह ज्या प्रकारे नोंदविला गेला आहे त्याद्वारे संबंधित आयोजकांच्या प्रतिमेस एक संकेत मिळतो. गांधी आणि आंबेडकर, अ स्टडी इन लीडरशिप या शीर्षकाच्या लेखात एलेनोर झेलियट यांनी 'वैकोम सत्याग्रह' साकारला आहे, या घटनेसंदर्भात मंदिरातील अधिका-यांशी गांधींनी केलेल्या वाटाघाटीचा समावेश आहे. याव्यतिरिक्त, ई.व्ही. रामासामी विचारांचे संपादक असे म्हणतात की ब्राह्मणांनी हेतुपुरस्सर ई.वी. रामासामी यांच्या सहभागाविषयीच्या बातम्या दडपल्या. यंग इंडिया या अग्रगण्य काँग्रेसच्या नियतकालिकात वायकॉमवरील आपल्या विस्तृत अहवालात ई.व्ही. रामासामीचा उल्लेख कधीच आढळत नाही.


केरळ आणि उर्वरित भारतातील प्रचलित जातीव्यवस्थेनुसार, निम्न जातीच्या हिंदूंना मंदिरात प्रवेश नाकारला गेला. केरळमध्ये, त्यांना मंदिरांकडे जाणा-या रस्त्यांवर चालण्याची परवानगी नाकारण्यात आली. 1956 मध्ये केरळ राज्याची स्थापना झाली; पूर्वी हे मलबार (उत्तर केरळ), कोचीन आणि त्रावणकोर राज्यांमध्ये व्यापकपणे विभागले गेले होते).  1923 मध्ये काँग्रेस पक्षाच्या काकीनाडा बैठकीत के. के. माधवन यांनी केरळमधील निराश जातींमधील भेदभाव दर्शविणारा अहवाल सादर केला. त्या सत्राने अस्पृश्यतेविरूद्धच्या हालचालींना प्रोत्साहन देण्याचा निर्णय घेतला.


केरळमध्ये या प्रदेशात अस्पृश्यतेच्या विरोधात लढा देण्यासाठी वेगवेगळ्या जातींच्या लोकांची समिती बनविली गेली. टी के माधवन, वलयुधा मेनन, कुरुर नीलाकांतन नंबूदिरीपाद आणि टीआर कृष्णस्वामी अय्यर यांनी बनविलेले के. फेब्रुवारी 1924 मध्ये त्यांनी मंदिरात प्रवेश मिळवण्यासाठी 'केरळपर्यतनम' सुरू करण्याचा निर्णय घेतला आणि जाती-धर्माची पर्वा न करता प्रत्येक हिंदूंसाठी सार्वजनिक रस्ते वापरण्याचा अधिकारही त्यांनी घेतला.

🪔 *निधन*

पेरियार यांचे २४ डिसेंबर १९७३ रोजी निधन झाले.

                                 

         

अवंतिकाबाई गोखले

 *

          *अवंतिकाबाई गोखले*                        

(स्वातंत्र्य सैनिक, गांधीजींची पट्टशिष्या)

          *जन्म : १७ सप्टेंबर १८८२*                            

           *मृत्यू : २६ मार्च १९४९* मराठीबरोबर इंग्रजी भाषेवरही प्रभुत्व असलेल्या अवंतिकाबाईंनी चंपारण्यातील सत्याग्रहापासून गांधीजींना साथ दिली. स्त्रियांच्या व्यक्तिविकास व सबलीकरणासाठी त्यांनी गिरगावात ‘हिंद महिला समाजा’ची स्थापना केली तसेच गिरणी कामगार स्त्रियांसाठी भारतात प्रथमच पाळणाघरे सुरू केली. याशिवाय अस्पृश्य समाजात सुधारणा घडवून आणण्यासाठी प्रयत्नही केले. १९३० व ३२ सालच्या मिठाच्या सत्याग्रहात मुंबईतून शेकडो स्त्रिया सामील झाल्या. त्याचे श्रेय बाईंनाच जाते. एक नि:स्पृह, स्पष्टवक्ती, अनुशासनप्रिय कार्यकर्ती म्हणून स्वातंत्र्यलढय़ाच्या इतिहासात त्यांना मानाचे पान आहे.

भा रताच्या स्वातंत्र्य आंदोलनाच्या इतिहासात गांधींची पहिली भारतीय शिष्या म्हणून अवंतिकाबाई गोखले ओळखल्या जातात. गांधीजींची व अवंतिकाबाईंची ओळख त्या वेळचे प्रसिद्ध तत्त्वज्ञ व विचारवंत श्रीनिवास शास्त्री यांनी करून दिली होती. ही बाई सामान्य नाही हे गांधीजींनी ओळखले. आपण हिंदुस्थानात दलित व स्त्रिया यांच्याकरिता जे काम करू इच्छितो त्यासाठी हीच कार्यकर्ती आपल्याबरोबर हवी, असे गांधीजींना वाटले.

अवंतिकाबाईंचे लग्न नवव्या वर्षी झाले होते. त्या वेळच्या पद्धतीप्रमाणे त्यांना लिहिता-वाचताही येत नव्हते. सासरी आल्यावर त्या लिहायला-वाचायला शिकल्या. विलायतेला शिकायला गेलेल्या नवऱ्याने अवंतिकाबाईला आपण परत येईपर्यंत इंग्रजीत लिहिणे, वाचणे व बोलणे न आल्यास आपण तुला नांदविणार नाही, अशी धमकी दिली. त्यामुळे घाबरून अवंतिकाबाई आपल्या सासऱ्याजवळ इंग्रजी शिकल्या. १९१९ पर्यंतचे त्यांचे जीवन मध्यमवर्गीय ब्राह्मण स्त्रीचे होते. त्या वर्षी त्यांच्या आयुष्याला कलाटणी मिळाली. इचलकरंजीच्या राणीला इंग्लंडला जायचे होते. तिच्यासोबत जाण्यासाठी समवयस्क, शिक्षित व इंग्रजी जाणणारी स्त्री म्हणून अवंतिकाबाईंची निवड झाली. विलायतेला गेल्यावर त्यांनी अनेक इस्पितळांना भेटी देऊन तिथल्या कार्यपद्धतीची माहिती करून घेतली. श्रीमंत घरातील स्त्रियांना त्यांनी स्वयंसेवी संस्थांतून काम करताना पाहिले. त्यांच्याशी त्यांचे काम व कामातील अडचणींबाबत चर्चा केली. त्यापासून स्फूर्ती घेऊन मायदेशी परतल्यावर गिरणगावात त्याच पद्धतीने त्यांनी काम सुरू केले. या भागात त्यांनी शिक्षणाचे व आरोग्याचे महत्त्व व मुलांचे योग्य पालनपोषण या बाबतीत जाणीवजागृती केली. या भागात गिरणी कामगार स्त्रियांसाठी भारतात प्रथमच पाळणाघरे सुरू केली. बाई स्वत: चित्पावन ब्राह्मण. घरात खूप सोवळेओवळे. पण हे सर्व बाजूला सारत त्या अस्पृश्य समाजात सुधारणा घडवून आणण्यासाठी धडपडू लागल्या.

१९१६ साली लखनौ काँग्रेसमध्ये त्यांची गांधीजींशी गाठ पडली. गांधीजींनी जेव्हा बिहार चंपारण्यातील निळीची शेती करणाऱ्या शेतकऱ्यांचे दु:ख ऐकले तेव्हा त्यांच्याबरोबर अवंतिकाबाईंनीही सत्याग्रहासाठी यावे अशी विनंती केली. चंपारण्याच्या सत्याग्रहामध्ये भाग घेण्यासाठी महाराष्ट्राच्या सत्याग्रही तुकडीत आनंदी वैशंपायन व अवंतिकाबाई गोखले या दोन महिला होत्या. बिहारमध्ये फिरून त्यांनी महिलांना आरोग्याचे धडे दिले. मुलींच्या शिक्षणाकरिता प्रचार केला. बडहरवा गावी मुलींची शाळा काढली. मुलींच्या शाळेला पुरुषांबरोबर स्त्रियांचाही विरोध होता. लिहिणे, वाचणे व त्यांच्यामध्ये स्वदेशप्रेम निर्माण करण्याचे अवघड काम अवंतिकाबाईंनी केले. चंपारण्यात त्यांनी मराठी भाषेतले पहिले गांधींचे चरित्र लिहायला सुरुवात केली. १९१९ मध्ये नाशिकमधल्या एका सभेत अवंतिकाबाईंचे भाषण ऐकून लोकमान्य टिळक प्रभावित झाले आणि ते उत्स्फूर्तपणे म्हणाले, ‘‘महाराष्ट्राची सरोजिनी आता तयार झाली आहे.’’

स्त्रियांची सर्वागीण उन्नती होण्यासाठी त्यांना एकत्र आणून त्यांचा व्यक्तिविकास व सबलीकरण व्हावे यासाठी शिक्षण देणे बाईंना आवश्यक वाटले. त्यासाठी त्यांनी गिरगावात ‘हिंद महिला समाजा’ची स्थापना केली. या समाजाच्या त्या स्वत: ३१ वर्षे अध्यक्ष होत्या. अवंतिकाबाईंनी या समाजात सूतकताईचे वर्ग सुरू केले. यशोदाबाई भट यांच्यातील कीर्तनाचे अंग ओळखून त्यांच्याकडून चाळीचाळीत फिरून राष्ट्रीय कीर्तने घडवून आणली. ‘स्त्रिया व राष्ट्र’ या विषयावर बोलण्यासाठी अखिल भारतीय पातळीवरचे बरेच नेते त्यांनी समाजात बोलावले. १९३० व ३२ सालच्या मिठाच्या सत्याग्रहात मुंबईतून शेकडो स्त्रिया सामील झाल्या. त्याचे श्रेय बाईंनाच जाते. ‘हिंद महिला’ नावाचे एक साप्ताहिक सुरू केले. फैजपूरच्या काँग्रेसला हिंद महिला समाजाच्या महिलांचा मोठा गट बाईंच्या नेतृत्वाखाली गेला. या अधिवेशनात खादी विक्रीची जबाबदारी बाईंनी उचलली व अधिवेशन काळात हजारो रुपयांची खादी विक्री चार-पाच दिवसांत करण्याचा विक्रम त्यांनी केला. त्यांनी स्वत: आमरण खादीच वापरली. स्वत: सूत कातून व विणून दरवर्षी त्या गांधींना धोतरजोडीची भेट पाठवीत. गांधीजी त्याबाबत गमतीने म्हणत, की अविबेनने मला धोतरजोडी दिली नाही तर मला लंगोटीच नेसावी लागेल.

१९२२ मध्ये मुंबई महानगरपालिकेने स्त्रियांचा मताधिकार व निवडणुका लढविण्याचा अधिकार मान्य केला. त्या कायद्याप्रमाणे झालेल्या निवडणुकीत सरोजिनी नायडू, बच्चूबेन लोटवाला, हॅडगिव्हसन व अवंतिकाबाई अशा चार स्त्रिया निवडून आल्या. त्यात अवंतिकाबाईंना प्रचंड मते मिळाली. परंतु काही तांत्रिक कारणामुळे त्यांची निवड रद्द झाली. बाईंना असलेला प्रचंड पाठिंबा व त्यांचे सामाजिक कार्य लक्षात घेऊन त्यांना १ एप्रिल १९२३ रोजी महानगरपालिकेत स्वीकृत सदस्यत्व मिळाले. १९३१ पर्यंत त्या सातत्याने स्वीकृत सदस्य होत्या. आपल्या मतदारसंघातील प्रश्न व ठराव मांडून त्यांनी महापालिका दणाणून सोडली.

आरोग्य व शिक्षण ही दोन खाती बाईंच्या जिव्हाळय़ाची. शाळेच्या आसपास अनारोग्यकारक खाद्यपेये विकली जाऊ नयेत, चौपाटीवर बसून हवा खावी, पदार्थ खाऊन कागद, द्रोण वगैरे टाकून वाळू खराब करू नये, अशा प्रकारचे ठराव त्यांनी मांडले. त्या सभागृहात मराठीतूनच बोलत. त्यांची भाषणे व युक्तिवाद विचारप्रवृत्त करणारे असत म्हणून त्यांना अध्यक्षांनी इंग्रजीत बोलायची विनंती केली. मराठीइतकेच त्यांचे इंग्रजी भाषणही प्रभावी होई. इंग्रजीच काय, पण मराठीही घरातल्या वडीलधाऱ्यांकडेच बाई शिकल्या होत्या. आपल्या कुशाग्र बुद्धीच्या जोरावर त्यांनी दोन्ही भाषांवर प्रभुत्व मिळविले होते.

१९२६मध्ये बाई महापालिकेच्या स्थायी समितीवर नियुक्त झाल्या. ही समिती अत्यंत महत्त्वाची असते. त्या वेळी बैठकीला हजर राहिल्यावर ३० रुपये भत्ता मिळे. ३० रुपयांचा चेक त्यांनी विठ्ठलभाई पटेलांकडे परत पाठविला. त्यांचे म्हणणे असे की निवडून आल्यावर बैठकीला हजर राहणे हे समिती सदस्याचे कर्तव्य आहे. त्यामुळे आपण बैठकीला हजर राहिल्याचा भत्ता घेणार नाही असे बजावले. यातील काही तांत्रिक गोष्टी विठ्ठलभाई पटेलांनी दाखवून देऊन हा भत्ता त्यांच्या आवडीच्या कार्यासाठी दान करण्याचा मार्ग दाखवला होता.

महानगरपालिकेच्या दवाखान्यात स्त्रियांची वैद्यकीय तपासणी व उपचाराची सोय त्यांनी करून घेतली. आठवडय़ात संपूर्ण एक दिवस स्त्रियांसाठी राखून ठेवला. स्त्रीरोगतज्ज्ञांची नेमणूक करून आयाबायांचा दुवा घेतला. आरोग्यासाठी असलेल्या सर्व सेवासंस्थामधून त्यातील अंदाधुंदी कारभारावर नियंत्रण ठेवण्यासाठी या सर्व सेवासंस्थांवर महानगरपालिकेचा प्रतिनिधी असल्याशिवाय व त्यांनी मान्यता दिल्याशिवाय त्या संस्थांना आर्थिक साहाय्य देऊ नये, असा ठराव पास करून घेतला. हे बाईंचे महत्त्वाचे कार्य.

१९२८मध्ये महापौरपदासाठी त्यांचे नाव सुचविले गेले. दुसरे नाव होते मुंबईतील प्रसिद्ध डॉ. गोपाळराव देशमुख यांचे. बाईंच्या मते डॉक्टर सर्वतोपरी योग्य उमेदवार होते. त्यामुळे त्यांनी आपण या पदासाठी इच्छुक नसल्याचे सांगितले. नाहीतर १९२८ सालीच मुंबईला पहिली महिला महापौर मिळाली असती. महानगरपालिकेत कर्मचारी व सदस्य यांना खादी घालणे काही कारणाने शक्य नसेल तर त्यांनी स्वदेशी कपडे वापरावे हा ठराव त्यांनी पास करून घेतला. हे त्यांचे महापालिकेचे शेवटचे योगदान. २६ ऑक्टोबर १९३० ला पोलीस कमिशनरचा हुकूम मोडून बाईंनी मुंबईच्या आझाद मैदानावर झेंडावंदन केले. या झेंडावंदनापूर्वी अवंतिकाबाई महिलांचा मोर्चा घेऊन मिरवणुकीने गेल्या. कृष्णाकुमारी सरदेसाई नावाच्या १३-१४ वर्षांच्या परकरी मुलीच्या हातात झेंडा होता. पोलिसांनी तिच्या हातावर लाठय़ा मारल्यामुळे ती खाली पडली. पण तिने झेंडा सोडला नाही. या महिलांवर घोडेस्वार सोडल्यामुळे महिला पांगल्या. अवंतिकाबाईंना दुसऱ्या दिवशी पालिका सदनात अटक होऊन सहा महिन्यांची शिक्षा झाली व त्यांचे नगरसेविकापद रद्द झाले. क्लेटन म्युनिसिपल कमिशनर असताना आपल्या भाषणात एकदा म्हणाले, की या सभागृहातील अवंतिकाबाईंचा अपवाद सोडता प्रत्येक जण माझ्याकडे शिफारशीसाठी आला आहे. अवंतिकाबाईंमुळे सभागृहातील चर्चेचे वातावरण व पातळी उंच राहते. त्यांची कामावरील निष्ठा, प्रामाणिकपणा व विचारांची स्पष्टता वाखाणण्यासारखी आहे. त्या निरनिराळय़ा कामात व्यग्र असूनही कधी सभागृहात गैरहजर नाहीत. निरनिराळय़ा वॉर्डात फिरून जनतेच्या सोयी, गैरसोयीची त्या दखल घेऊन सभागृहात वाचा फोडत. बाईंचे महानगरपालिकेतील काम उत्तुंग होते. नंतरच्या नगरसेविकांत हे स्थान फक्त मृणाल गोरे मिळवू शकल्या. बाईंचे हे काम लक्षात घेऊनच त्यांच्या घरावरून जाणाऱ्या रस्त्याला ‘अवंतिकाबाई गोखले रोड’ हे नाव महानगरपालिकेने दिले.

१९३० साली सविनय कायदेभंगाच्या वेळी ७ एप्रिल रोजी झालेल्या प्रचंड सभेत बाईंचे भाषण फारच प्रभावी झाले. त्यांनी महाराष्ट्रातील वीरवृत्तीला आवाहन करून सांगितले, की या आंदोलनात भाग घेऊन महाराष्ट्राचे नाव उज्ज्वल केले पाहिजे. आपण गांधीजींच्या मागे उभे राहिले पाहिजे. विलायती वस्तूंवर बहिष्कार, दारूबंदी व आगामी कायदेमंडळाच्या निवडणुकीवर बहिष्कार घातला पाहिजे.

युद्ध समिती नावाची एक समिती सत्याग्रहाची योजना व अंमलबजावणी करण्यासाठी नेमली होती. या समितीच्या तेराव्या तुकडीच्या प्रमुख अवंतिकाबाई होत्या. पहिल्या बारा तुकडय़ा गजाआड गेल्या. बाईंचे पती बबनराव यांचे दोन्ही हात निकामी होते. त्यांचे सर्व काम करावे लागे. म्हणून बाईंना गांधीजींनी सत्याग्रह करण्याऐवजी बाहेर राहून कार्यकर्त्यांना मार्गदर्शन करावे, असे सुचविले. पण युद्ध समितीच्या प्रमुखाने सत्याग्रह न करणे हे नैतिकतेला धरून होणार नाही, असे सांगून त्यांनी सत्याग्रह करायचे ठरविले. त्यापूर्वी जमलेल्या स्त्रियांनी आपल्या हातात झेंडे घेऊन उंच फडकावले म्हणून पोलिसांनी त्यांना पकडून भांडुपच्या जंगलात सोडले व अपमानास्पद वागणूक दिली. त्याचा निषेध करणारे एक पत्रक २७ ऑक्टोबरला काढले. त्यांच्यावर या कृत्याबद्दल खटला होऊन सहा महिने कैद व ४०० रुपये दंड झाला. १९३२ साली त्यांना पुन्हा दोन महिने तुरुंगवास झाला.

पती बबनराव यांना १९३३ साली हृदयविकाराचा झटका आला. गांधीजींनी बाईंना आपल्या अपंग व नाजूक हृदय झालेल्या पतीकडे संपूर्ण लक्ष देण्यास सांगितले. १९३७ च्या प्रांतिक स्वायत्ततेच्या कायद्यानुसार होणाऱ्या निवडणुकीला उभे राहण्यासाठी सरोजिनीदेवींनी खूप पाठपुरावा केला. पण अपंग पतीसाठी त्यांनी घरी राहायचे ठरविले. १९४० किंवा १९४२च्या आंदोलनातही त्या भाग घेऊ शकल्या नाहीत. १९३३ पासून स्वत:च्या मृत्यूपर्यंत त्यांचे विधायक कार्य चालूच राहिले. १९४७च्या आसपास त्यांना कर्करोग झाल्याचे कळले. त्याच वेळी स्वातंत्र्य मिळाले. गांधीजींना पट्टशिष्येच्या या आजाराचे अतीव दु:ख झाले. त्यांनी बाईंना उल्हसित करणारे एक पत्र लिहिले. हे पत्र गांधीजींनी अवंतिकाबाईंना लिहिलेले शेवटचे पत्र.

३० जानेवारी १९४८ ला गांधीजींची नथुराम गोडसेने हत्या केली. त्याचा धक्का अवंतिकाबाईंना बसला. त्यांना भास होऊ लागले. बापू मला बोलवीत आहेत, तुम्हीही चला, असे त्या बबनरावांना सांगू लागल्या. गांधीजींपाठोपाठ सव्वा वर्षांनी त्यांच्या या पहिल्या भारतीय शिष्येने २६ मार्च १९४९ ला मुंबईत राहत्या घरी देह ठेवला. एक नि:स्पृह, स्पष्टवक्ती, अनुशासनप्रिय कार्यकर्ती म्हणून स्वातंत्र्यलढय़ाच्या इतिहासात त्यांना मानाचे पान आहे.     

                                 

         

भारतरत्न आचार्य विनोबा भावे


          

      *भारतरत्न आचार्य विनोबा भावे*

(अहिंसा आणि मानवाधिकाराचे भारतीय पुरस्कर्ता, भूदान चळवळीचे प्रवर्तक)


पुर्ण नाव : विनायक नरहरी भावे

        *जन्म : ११ सप्टेंबर १८९५*

         (गागोदे, पेण , जि. रायगड)

        *मृत्यू : १५ नोव्हेंबर १९८२*                                             (लक्ष्मीपूजन -दिवाळी)

        (पवनार, वर्धा, महाराष्ट्र, भारत)

चळवळ : भारतीय स्वातंत्र्यलढा,

भूदान चळवळ

पुरस्कार : भारतरत्न पुरस्कार (१९८३)

धर्म : हिंदू

प्रभाव : महात्मा गांधी

वडील : नरहर शंभूराव भावे

आई : रखुमाबाई नरहर भावे

                विनायक नरहरी भावे (आचार्य विनोबा भावे नावाने प्रसिद्ध)  हे भारतीय स्वातंत्र्यसैनिक व भूदान चळवळीचे प्रणेते होते. महात्मा गांधींनी १९४० मध्ये 'वैयक्तिक सत्याग्रह' पुकारला, त्यावेळीही पहिले सत्याग्रही म्हणून त्यांनी आचार्य विनोबा भावे यांची निवड केली. ब्रिटिश राजविरोधी या आंदोलनाचे पर्यवसान १९४२ मध्ये 'छोडो भारत' आंदोलनात झाले. भावे पुढे सर्वोदयी नेते म्हणून प्रसिद्ध झाले.

💁🏻‍♂️ *सुरुवातीचे जीवन*

(११ सप्टेंबर १८९५ - १५ नोव्हेंबर १९८२). थोर गांधीवादी आचार्य व भूदान चळवळीचे प्रवर्तक. कोकणातील रायगड जिल्ह्यातील पेण तहसिलातील गागोदे या गावी विनोबा तथा विनायक नरहर भावे यांचा जन्‍म झाला. आजोबांचे नाव शंभुराव भावे. शंभुराव भावे यांचे जन्मगाव वाई. त्यांच्या अनेक पिढ्यांचे वास्तव्य वाई येथे होते. वाईच्या ब्राम्हणशाही या मोहल्ल्यात कोटेश्वर मंदिर आहे. हे भावे यांच्या मालकीचे असून तेथे शंभुरावांनी अग्‍निहोत्र स्वीकारून अग्‍निहोत्र शाळा स्थापली होती. आजोबा आणि मातुश्रींपासून धर्मपरायणतेचे संस्कार विनोबांना मिळाले. त्यांचे वडील नरहरी शंभुराव भावे व आई रखुमाबाई. वडील नोकरीच्या निमित्ताने बडोदे येथे गेले. विनोबांचे माध्यमिक आणि उच्च शिक्षण बडोदे येथेच झाले. १९१६ साली महाविद्यालयीन इंटरची परीक्षा देण्यासाठी ते मुंबईस जाण्यास निघाले; परंतु वाटेतच सुरतेस उतरून आईवडिलांना न कळविताच वाराणसी येथे रवाना झाले. त्यांना दोन गोष्टींचे आकर्षण होते. एक हिमालय व दुसरे बंगालचे सशस्त्र क्रांतिकारक, वाराणसी येथे हिंदु विश्वविद्यालयातील एका समारंभात महात्मा गांधीचे भाषण झाले. त्याचा त्यांच्या मनावर खोल परिणाम झाला. हिमालयातील अध्यात्‍म आणि बंगालमधील क्रांती यांच्या दोन्ही प्रेरणा महात्मा गांधीच्या उक्तीत आणि व्यक्तिमत्त्वात त्यांना आढळल्या. त्यांनी महात्मा गांधींशी पत्रव्यवहार केला व गांधींची कोचरब आश्रमात ७ जून १९१६ रोजी भेट घेतली आणि तेथेच त्या सत्याग्रहश्रमात नैष्ठिक ब्रह्मचर्याची प्रतिज्ञा करून जीवनसाधना सुरू केली. ऑक्टोबर १९१६ रोजी महात्मा गांधींची एक वर्षांची रजा घेऊन ते वाई येथे प्राज्ञपाठशाळेत वेदान्ताच्या अध्ययनाकरिता उपस्थित झाले. ब्रह्यविद्येची साधना त्यांचा जीवनोद्देश होता.


*जीवन कार्य*

🇮🇳 *स्वातंत्र्य लढा*

                     महात्मा गांधींसोबत

ते भारतीय स्वातंत्र्य लढ्यामध्ये महात्मा गांधींसोबत होते. स्वातंत्र्य लढ्यातील सहभागाबद्दल सन १९३२ मध्ये त्यांना तुरुंगवास घडला.


🔮 *सामाजिक व धार्मिक कार्य*

            वाई येथील प्राज्ञपाठशाळा मंडळाचे संस्थापक व मुख्याध्यापक स्वामी केवलानंद सरस्वती (पूर्वाश्रमीचे नारायणशास्त्री मराठे) यांच्यापाशी विनोबांनी उपनिषदे, ब्रह्मसूत्र शांकरभाष्य, पांतजलयोगसूत्रे इ. विषयांचे अध्ययन केले. माहुली येथील स्वामी कृष्णानंद यांच्या आश्रमातील काही प्रौढ विद्यार्थी-शिवनामे, वि. का. सहस्रबुद्धे इत्यादी मंडळीही त्यांच्याबरोबर सहाध्यायी होती. दिनकरशास्त्री कानडे व महादेवशास्त्री दिवेकर हे प्राज्ञपाठशाळेची व्यवस्थापनाची व अन्य प्रकारची कामे पाहत होते. प्रत्येक सोमवार हा या पाठशाळेचा सुटीचा म्हणजे अनध्ययनाचा दिवस असे. त्या दिवशी पाठशाळेची अंगमेहनतीची कामे शिक्षक-विद्यार्थी उरकत असत आणि प्रज्ञानंदस्वामींच्या समाधिस्थानाच्या सभागृहात विद्यार्थी व शिक्षक यांच्या शास्त्रार्थ चर्चेकरता साप्ताहिक सभा भरत. चर्चेचे विषय सामाजिक, धार्मिक, तात्‍त्‍विक हे असतच; परंतु त्याबरोबर प्रचलित राजकारणाची अनेक बाजूंनी मीमांसाही चालत असे. दिनकरशास्त्री कानडे हे सेनापती बापट, स्वातंत्र्यवीर सावरकर, योगी अरविंद घोष इत्यादी सशस्त्र क्रांतीकारकांच्या मार्गाने चालणाऱ्या एका गुप्त कटाचे सदस्य होते. सशस्त्र क्रांतीच्या तत्त्वज्ञानाचा ते पुरस्कार करीत. विनोबांच्याप्रमाणेच त्यांचेही वक्‍तृत्व अमोघ होते. अहिंसक क्रांताची वैचारिक भूमिका विनोबा मोठ्या परिणामकारक रीतीने या साप्ताहिक सभांमध्ये मांडीत असत. १९१७ साली हिवाळ्यात वाई येथे प्लेगची साथ उद्‍‌भवली. कृष्णेच्या दक्षिण तीरावर राहुट्या आणि पर्णशाला उभारून त्यांत प्राज्ञपाठशाळेचे विद्यार्थी व शिक्षक जवळजवळ ४ महिने राहिले. वेदान्ताचे व इतर शास्त्रांचे पाठ त्यांतील एका विस्तृत पर्णशालेमध्ये चालत असत. विनोबा पर्णशालेबाहेरच्या कृष्णाकाठच्या आम्रवृक्षाच्या छायेखाली उपनिषदांचे व शांकरभाष्याचे उच्च स्वरात वाचन करीत, हळूहळू सावकाश फेऱ्या मारीत असत. त्यांचे ते प्रसन्न वाचन ऐकून स्वामी केवलनंदांच्या मनावर विनोबाजींच्या व्यक्तिमत्त्वाची खूप खोल छाप पडली, विनोबांनी वेदान्ताविषयामध्ये खूप वेगाने १० महिन्यांत प्रगती केली. आपण कोणकोणत्या ग्रंथांचे व विषयांचे अध्ययन केले याचा सविस्तर वृतान्त त्यांनी महात्मा गांधींना कळवला. गांधीं हे वृत्तान्तपत्र वाचून अत्यंत विस्मित झाले. त्या पत्राच्या उत्तरात म. गांधींनी अखेर म्हटले की, " ए गोरख, तूने मच्छिंदरको भी जीत लिया है !".


                    विनोबा वाईहून परत अहमदाबादला फेब्रुवारी १९१८ मध्ये परतले. १९१८ साली एन्फ्ल्यूएंझाची साथ देशभर पसरली. लक्षावधी लोक त्या साथीला बळी पडले. त्यात विनोबांचे वडील, मातुश्री आणि सगळ्यात धाकटा भाऊ दत्तात्रय हे आजारी पडले. ही गोष्ट महात्मा गांधीना कळल्यावर त्यांनी विनोबांना मातुश्रींच्या शुश्रूषेकरता बडोद्यास जाण्याचा आग्रह धरला. विनोबा तयार नव्हते. गांधीनी त्यांचे मन वळवले. आई आणि धाकटा भाऊ या रोगाला बळी पडले. वडील बरे झाले. विनोबा सर्वांत ज्येष्ठ पुत्र, म्हणून आईचा अंत्यविधी त्यांनीच करणे प्राप्त होते. पुरोहिताकडून अंत्यविधीचा संस्कार करवून घेणे विनोबांना मान्य नव्हते. म्हणून ते स्मशानात गेले नाहीत. वडिलांनी पद्धतीप्रमाणे अंत्यविधी उरकून घेतला.


१९२१ साली गांधींचे भक्त शेठ जमनालाल बजाज यांनी साबरमतीच्या सत्याग्रह आश्रमाची शाखा वर्ध्याला काढली. त्या शाखेचे संचालक म्हणून महात्मा गांधीनी विनोबांची रवानगी वर्ध्यास केली. ८ एप्रिल १९२१ रोजी विनोबा वर्ध्याला पोहोचले. आतापर्यंत संबंध आयुष्य -१९५१ ते ७३ पर्यंतची भूदानयात्रा सोडल्यास या वर्ध्याच्या आश्रमातच राहून विनोबांनी तपश्चर्या करीत जीवन घालविले. हा वर्ध्याचा आश्रम क्रमाने मगनवाडी, बजाजवाडी, महिलाश्रम, सेवाग्राम व पवनार ह्या ठिकाणी फिरत राहिला. ही सर्व ठिकाणे वर्ध्याच्या ८ किमी. परिसरातच आहेत. दिवसातले सात-आठ तास सूत कातणे, विणणे आणि शेतकाम यांमध्ये त्यांनी घालविले. रोज नेमाने शरीरश्रम प्रत्येक माणसाने करावे, असा त्यांचा सिद्धान्त होता. 'शरीरश्रमनिष्ठा' हे त्यांच्या जीवन-तत्त्वज्ञानाप्रमाणे महत्त्वाचे व्रत होते. शरीरश्रमांबरोबरच त्यांनी मानसिक, आधात्मिक साधनाही प्रखरतेने केली. १९३० व ३२ च्या सविनय कायदेभंगाच्या चळवळीत त्यांनी कारागृहवास भोगला. १९४० साली महात्मा गांधीनी स्वराज्याकरिता वैयक्तिक सत्याग्रहाचे आंदोलन आरंभले. त्यात पहिला सत्याग्रही म्हणून विनोबांची निवड केली. जवाहरलाल नेहरू हे दुसरे निवडले. आध्यात्मिक साधनेला वाहून घेतलला शत्रुमित्रसमभावी तपस्वी मनुष्य सत्याग्रहाला अत्यंत आवश्यक, म्हणून त्यांनी विनोबांची निवड केली. कारण सत्याग्रह हे शत्रूच्या हृदयपरिवर्तनाचे नैतिक शुद्ध साधन होत, अशी महत्मा गांधीची मूलभूत राजकीय भूमिका होती. उच्चतम आध्यात्मिक जीवनसाधनेस वाहिलेला शत्रुमित्रभाव विसरलेला माणूसच असे हृदय-परिवर्तन करू शकतो, अशी गांधींची धारणा होती. २० ऑक्टोबर १९४० रोजी स्वसंपादित हरिजन साप्ताहिकात गांधींनी आपल्या या शिष्याची ओळख करून दिली आहे.


१९३२ सालच्या सविनय कायदेभंगाच्या सामुदायिक आंदोलनात विनोबांनी भाग घेतला. त्यांनी धुळे कारागृहामध्ये शिक्षा भोगली. सुप्रसिद्ध गीताप्रवचने या कारागृहात त्यांनी दिली. शंभरापेक्षा अधिक सत्याग्रही कैदी आणि इतर गुन्ह्यांसाठी शिक्षा झालेले कैदी या प्रवचनांच्या रविवारच्या सभेत उपस्थित असत. त्यांमध्ये शेठ जमनालाल वजाज, गुलजारीलाल नंदा, अण्णासाहेब दास्ताने, साने गुरूजी इ. मंडळी उपस्थित असत.


या प्रवचनांचा मुख्य दृष्टिकोन 'गीता ही साक्षात भगवंताची उक्ति होय', असा होता. त्या उक्तीला पूर्ण प्रमाण मानूनच, त्यासंबंधी कसलीही साधकबाधक चर्चा न करताच त्यांनी ती १८ प्रवचने दिली. लो. टिळकांच्या गीतारहस्याचा मुख्य दृष्टिकोन त्यांनी मानला नाही. आद्य शंकराचार्याचाच मुख्य दृष्टिकोन मान्य केला, असे दिसून येते. मोहनिरास म्हणजे अज्ञाननाश हे गीतेचे मुख्य उद्दिष्ट त्यांनी मानले. अर्जुनाला युद्धास प्रवृत्त करणे हा उद्देश गृहीत धरून केलेला कर्मयोगाचाच उपदेश गीतेत आहे, हा टिळकांचा दृष्टिकोन विनोबांनी स्वीकारली नाही. विनोबांनी निष्काम कर्मयोग मान्य केला; परंतु युद्धोपदेशाकडे कानाडोळा केला. महात्मा गांधींच्या मताने गीतेमध्ये युद्धाचा आदेश हा भौतिक सशस्त्र युद्धाचा आदेश नाही. मानवी हृदयात चाललेल्या सद्‍भावना व असद्‍भावना यांच्या संघर्षाला काव्यमय बनवण्साठी योजलेले मानवी सशस्त्र युद्धाचे कविकल्पित रूपक गीतेने योजिलेले आहे; महाभारत हा इतिहासग्रंथ नाही म्हणून त्यातील योद्धे आणि युद्धात गुंतलेले शत्रुमित्रपक्ष हे केवळ कविकल्पित होत; असे महत्मा गांधी अनासक्ति योग या पुस्तकात प्रतिपादितात. विनोबा आणि गांधी हे दोघेही निरपवाद अहिंसा तत्त्वाचे पुरस्कर्ते. भगवद्‍गीता वाचत असताना विनोबा भगवद्‍गीता हा युद्धोपदेश नाही असे सांगतात आणि महत्मा. गांधी ते आध्यात्मिक भावनांचे युद्ध होय, असे सांगतात. हा युद्धाचा मुद्दा सोडला, तर सगळ्या एकेश्वरवादी धार्मिकांना प्रेरणा देणारे अत्युच्च जीवनविषयक व विश्वविषयक तत्त्वज्ञान अतिशय सुंदर रीतीने गीतेमध्ये सांगितले असल्यामुळे गीता हा हिंदूंनाच नव्हे तर जगातील अध्यात्मवाद्यांना मोहून टाकणारा ग्रंथ आहे, यात शंका नाही. म्हणूनच, गीता जरी सशस्त्र हिंसात्मक युद्धाचा पुरस्कार करत असली, तरी गांधींना आणि विनोबांना या गीतेने कायम मोहून टाकले आहे. म्हणून गांधींनी आणि विनोबांनी जन्मभर सकाळ-संध्याकाळ चालविलेल्या प्रार्थनासंगीतात भगवद्‍गीता ही कायमची अंतर्भूत केली होती.


वैयक्तिक सत्याग्रहानंतर ७ मार्च १९५१ पर्यंत पवनार येथील परंधाम आश्रमातच विनोबांनी शारीरिक आणि मानसिक तपश्चर्येत जीवन व्यतीत केले. १९३६ पासून म. गांधी साबरमतीचा आश्रम सोडून सेवाग्रामला म्हणजे पवनारजवळच येऊन राहिले. त्यामुळे गांधी आणि विनोबा यांचा चिरकाल संवाद चालू राहिला. गांधीच्या देहान्तानंतर सर्वसेवासंघ व सर्वोदय समाज या संस्थांची स्थापना झाली. मार्च १९४८ मध्ये विनोबा दिल्ली येथे जवाहरलाल नेहरू यांच्या विनंतीवरून गेले. भारत-पाक फाळणी झाल्यानंतर परागंदा झालेले लक्षावधी शरणार्थी (सर्व बाजूंनी जीवन उद्‍ध्वस्त झालेले) दिल्ली, पंजाब, राजस्थान यांमध्ये आले. त्यांना धीर देण्याकरता विनोबांना पंडितजींनी बोलावून घेतले. या दौऱ्यात सर्वधर्मसमभावाचा आदेश देऊन प्रेम आणि सद्‍भावना निर्माण करण्याचा प्रयत्‍न विनोबांनी केला.


दिनांक १५ नोव्हेंबर १९८२ रोजी सकाळी ९.४० वाजता पवनार येथे परंधाम आश्रमात सतत सात दिवस प्रायोपवेशन करून भूदाननेते आचार्य विनोबा भावे यांनी वयाच्या ८७ व्या वर्षी प्राणत्याग केला. त्यांच्या निधनाची वार्ता त्यांनी प्रायोपवेशन सुरू केल्यानंतर केव्हाही अपेक्षित होती. ५ नोव्हेंबर रोजी विनोबांना ताप आला, त्याबरोबरच हृदयविकारही उद्‍भवला आणि प्रकृती चिंताजनक झाली. उपचार त्वरित सुरू झाले. वैद्यकीय महाविद्यालयाच्या रूग्‍णालयात उपचार करण्याकरता नेण्याचा विचार तज्‍ज्ञ डॉक्‍टरांनी विनोबांना सांगितला; परंतु त्यांनी परंधाम आश्रम सोडण्यास नकार दिला व तेथेच उपचार सुरू झाले. मुंबई येथील जसलोक हॉस्पिटलचे तज्‍ज्ञ डॉ. मेहता मुंबईहून आले. हळूहळू प्रकृती सुधारेल अशी आशा उत्पन्न झाली. अ‍ॅलोपथीचे उपचारही विनोबांनी स्वीकारले, परंतु ८ नोव्हेंबर रोजी रात्री अन्नपाणी आणि औषधे या तिन्ही गोष्टी घेण्यास त्यांनी नकार दिला. आचार्यांचे बंधू शिवाजीराव भावे, मित्र दादा धर्माधिकारी इत्यादी मंडळींनी व आश्रमस्थ भक्तजनांनी आचार्यांना परोपरीने काकुळतीस येऊन, अन्नपाणी व औषधे घेण्याची विनंती केली. ती त्यांनी नाकारली. इंदिरा गांधी विनोबाजींना १० नोव्हेंबर रोजी भेटल्या. अन्नपाणी, औषधे घेण्याची विनंती त्यांनीही केली. प्रायोपवेशनाचा संकल्प करण्याचे कारण आचार्यांनी श्री. त्र्यं. गो. देशमुख व इतर भक्तांना स्पष्ट करून सांगितले. ते म्हणाले- " आता देह आत्म्याला साथ देत नाही. रखडत जगण्यात अर्थ नाही. जराजर्जर शरीर टाकणेच ठीक !"


🏛️ *विनोबांची समाधी, परंधाम आश्रम, पवनार, वर्धा*

                 आचार्यांच्या निधनाची वार्ता भारतभर व जगभर सर्व प्रचारमाध्यमांतून विद्युतवेगाने पसरली. या निधनाला कोणी महानिर्वाण म्‍हणाले, कोणी युगपुरुषाची समाधी म्‍हणाले. महात्‍मा गांधींच्या आध्यात्मिक परंपरेचे ते एक श्रेष्ठ वारस होते. त्यांचे हे प्रायोपवेशनाचे तंत्र हिंदू धर्म, बौद्ध व विशेषतः जैन धर्म या तिन्ही धर्मांना प्राचीन कालापासून मान्य असलेले तंत्र आहे. जैन धर्मात या तंत्रास 'सल्लेखना' अशी संस्कृत संज्ञा आणि 'संथारा' ही प्राकृत संज्ञा आहे. हिंदु धर्मात यास 'प्रायोपवेशन' म्हणतात. प्राय म्हणजे तप. तपाचा एक मुख्य अर्थ ' अनशन ' असा आहे. देहाचे दुर्घर व्याधी बरे होऊ शकत नाहीत, असे निश्चित झाल्यावर रूग्णाला जलप्रवेशाने, अग्‍निप्रवेशाने, भृगुपतनाने (उंच कड्यावरून उडी मारून), अनशनाने (अन्नपाणी वर्ज्य करून) किंवा अन्य कोणत्याही इष्ट मार्गाने देहविसर्जन करण्याची हिंदुधर्मशास्त्राने अनुमती दिली आहे. ज्ञानदेवादी संतांनी योगमार्गाने देहत्याग केला आहे. हा योगमार्ग गुरूगम्यच आहे. त्याचे वर्णन गीतेच्या आठव्या अध्यायात केले आहे. तात्पर्य, प्रायोपवेशन किंवा योगशास्त्रातील देहत्यागाची युक्ती हिंदुधर्मशास्त्राने मान्य केली आहे. विनोबांनी प्रायोपवेशनाच्या द्वारे देहत्याग केला. अनेक जैन साधू आणि साध्वी स्त्रिया आजही प्रतिवर्षी अशा प्रकारे देहत्याग करीत असतात आणि त्याची वार्ता वृत्तपत्रांतही केव्हा केव्हा येते. स्वातंत्र्यवीर सावरकर, धर्मानंद कोसंबी यांनी अशाच प्रकारे देहत्याग केला आहे.


⛲ *विनोबांचे विचार*

१) वर्तमानाला बंधन असावे म्हणजे वृत्ति मोकळी राहते. २) सत्य, संयम, सेवा ही पारमार्थिक जीवनाची त्रिसूत्री आहे . [१] ३) आध्यात्मिक व्यवहार म्हणजे स्वाभाविक व्यवहार म्हणजे शुद्ध व्यवहार . ४) हिंदुधर्माचे स्वरूप : आचार-सहिष्णुता, विचारस्वातंत्र्य, नीति- धर्माविषयी दृढता. ५) प्राप्तांची सेवा, संतांची सेवा, द्वेष कर्त्याची सेवा ही सर्वोत्तम सेवा. ६) असत्यात शक्ति नाही. आपल्या अस्तित्वासाठी हि त्याला सत्याचा आश्रय घेणे भाग आहे. ७) सत्य , संयम, सेवा ही पारमार्थिक जीवनाची त्रिसूत्री आहे. ८) ईश्वर, गुरु ,आत्मा, धर्म, आणि संत ही पाच पूजास्थाने . ९) इतिहास म्हणजे अनदिकालापासून आत्तापर्यंत चे सर्व जीवन. पुराण म्हणजे अनदिकालापासून आत्तापर्यंत टिकलेला अनुभवाचा अमर अंश.


🗽 *विनोबांचे स्मारक*

          विनोबांसह नरहर कुरुंदकर, वसंतदादा पटील, बालगंधर्व, जी.डी. बापू लाड, नागनाथ‍अण्णा नायकवाडी, बाळासाहेब देसाई (सातारा), भाई सावंत, बाळासाहेब सावंत (रत्‍नागिरी), चिंतामणराव देशमुख, संताजी घोरपडे, मारोतराव कन्नमवार, आदी व्यक्तीची स्मारके उभारण्याचे महाराष्ट्रातील काँग्रेस सरकारने ठरवले होते, पण यांतील एकही स्मारक पूर्णत्वास गेले नाही.


📙✍️ *पुस्तके*

अष्टादशी (सार्थ)

ईशावास्यवृत्ति

उपनिषदांचा अभ्यास

गीताई

गीताई-चिंतनिका

गीता प्रवचने

गुरुबोध सार (सार्थ)

जीवनदृष्टी

भागवत धर्म-सार

मधुकर

मनुशासनम्‌ (निवडक मनुस्मृती - मराठी)

लोकनीती

विचार पोथी

साम्यसूत्र वृत्ति

साम्यसूत्रे

स्थितप्रज्ञ-दर्शन

📚 *चरित्रग्रंथ*

आमचे विनोबा (राम शेवाळकर आणि इतर)

गांधी, विनोबा आणि जयप्रकाश (मिलिंद बोकील)

दर्शन विनोबांचे (राम शेवाळकर)

ब्रह्मर्षी विनोबा (बालसाहित्य, लेखक - विठ्ठल लांजेवार)

महर्षी विनोवा (राम शेवाळकर)

महाराष्‍ट्राचे शिल्‍पकार विनोबा भावे (लेखक : किसन चोपडे.) (महाराष्ट्र सरकारचे प्रकाशन)

विनोबांचे धर्मसंकीर्तन (राम शेवाळकर आणि इतर))

विनोबासारस्वत (राम शेवाळकर आणि इतर)

साम्ययोगी विनोबा (राम शेवाळकर)

         

भारतरत्न मदर टेरेसा


  

         *महान समाज सेविका* 

        *भारतरत्न मदर टेरेसा*


*“जर जीवन दुसऱ्या करता जगता आले नाही तर ते जीवन नाही"*


    *जन्म : 26 ऑगस्ट 1910*

    ( स्कॉप्जे शहर, मसेदोनिया )

       *मृत्यू : 5 सप्टेंबर 1997*

             ( कलकत्ता, भारत )


नाव : अगनेस गोंझा बोयाजिजू

वडिल : निकोला बोयाजू

आई  : द्रना बोयाजू

कार्य : मिशनरी ऑफ चैरिटी ची

          स्थापना, मानवतेची सेवा


             या लेखाच्या सुरूवातीला लिहीलेले वाक्य महान समाज सेविका मदर टेरेसा यांचे आहे. या वाक्या नुसार समर्पित आयुष्य जगलेल्या मदर टेरेसा यांनी आयुष्यभर दुसऱ्याची सेवा आणि सहाय्य करत स्वतःला समर्पित केले. ती एक अत्यंत उदार, दयाळु आणि निस्वार्थ प्रेम करणारी महिला होती त्यांच्या रोमा रोमात दया आणि सेवेचा भाव भरून होता. निस्वार्थ भावाने मदर टेरेसा गरिब, आजारी, लाचार, असाहय्य आणि गरजवंतांची मदत करत असत. त्या स्वतःकरता नव्हे तर इतरांकरता जगत होत्या. त्या मुळात भारतिय वंशाच्या नव्हत्या परंतु त्या ज्यावेळी भारतात आल्या तेव्हां त्यांना येथील लोकांकडुन इतके प्रेम आणि स्नेह मिळाला की त्यांनी आपले उरलेले आयुष्य भारतात व्यतीत करण्याचा निर्णय घेतला, ईतकेच नव्हें तर भारतिय समाजात त्यांनी महत्वपुर्ण योगदान देखील दिलं. सामाजिक कार्यात दिलेल्या महत्वपुर्ण योगदानाकरता मदर टेरेसा यांना देशातील सर्वोच्च असा भारत सन्मान देखील मिळाला. पद्मश्री आणि नोबेल पुरस्काराने देखील त्यांना सन्मानित करण्यात आले आहे. मदर टेरेसा यांच्याकडुन प्रत्येकाने प्रेरणा घेण्याची गरज आहे. मानवतेचे त्या एक उत्तम उदाहरण ठरल्या, निस्वार्थ आई प्रमाणे सेवाभावाने काळजी घेणाऱ्या मदर टेरेसा यांना गरीबांची कैवारी, दयाळु आई, मदर मेरी आणि विश्वजननी अश्या अनेक नावांनी ओळखत असत. आज या आर्टिकल मधुन आम्ही आपल्याला त्यांच्या जन्मापासुन त्यांचे भारत आगमन आणि समाजाकरता त्यांनी केलेल्या महान कार्यांची, त्यांच्या संघर्षाची माहिती सांगणार आहोत. 


👨‍👩‍👧‍👧 *मदर टेरेसा यांचा जन्म आणि परिवार*

             26 ऑगस्ट 1910 साली मसेदोनियातील स्कॉप्जे येथे एक साधारण व्यापारी निकोला बोयाजू यांच्या घरी अगनेस गोंझा बोयाजिजू ने जन्म घेतला होता. यानांच पुढे मदर टेरेसा म्हणुन जग ओळखु लागले. गोंझा चा अर्थ अलबेनियन भाषेत ’कळी’ (फुल) असा होतो. त्यांचे वडील निकोला बोयाजू धार्मिक प्रवृत्तीचे व्यक्तिमत्व होते, ईसा मसीह यांच्यावर त्यांचा फार विश्वास. त्या ज्यावेळी 8 वर्षांच्या होत्या त्यावेळी त्यांच्या वडिलांचे निधन झाले. वडिलांच्या निधनानंतर तिचा सांभाळ तिची आई द्राना बोयाजूंनी केला. त्या एक धर्मपरायण आणि आदर्श गृहीणी होत्या, मदर टेरेसांवर आईच्या संस्कारांचा आणि शिक्षणाचा फार प्रभाव पडला. वडिलांच्या अकाली जाण्याने त्यांच्या घरातील परिस्थीती अत्यंत हालाखीची झाली होती त्यामुळे मदर टेरेसा यांचे लहानपण फार संघर्षमय परिस्थीतीतुन गेले. मदर टेरेसा लहानपणी आपल्या आई आणि बहिणीबरोबर चर्च मधे जाऊन धार्मिक गीत गायन करीत असे. ती ज्यावेळी केवळ 12 वर्षांची होती तेव्हां एका धार्मिक यात्रेला गेलेली असतांना येशुच्या परोपकार आणि समाजसेवेच्या शिकवणीला जगभरात पोहोचविण्याचा त्याचा प्रचार प्रसार करण्याचा निर्णय घेतला व आपले संपुर्ण जीवन गरिबांच्या सेवेत समर्पित करण्याचा तिने मनोमन निश्चय घेतला होता. 1928 साली ज्यावेळी मदर टेरेसा फक्त 18 वर्षांची होती तेव्हां त्यांनी नन चा समुदाय ’सिस्टर्स ऑफ लोरेटो’ त सहभागी होण्याचा निर्णय घेतला आणि घर सोडले. पुढे त्या आयरलैंड येथे गेल्या आणि इंग्लिश भाषा शिकल्या कारण ’लोरेटो’ च्या सिस्टर्स इंग्रजी माध्यमातुनच भारतात लहान मुलांना शिकविण्याचे कार्य करत होत्या. या दरम्यान त्यांनी एका इन्स्टीटयुट मधुन नन होण्याचे ट्रेनिंग पुर्ण केले. नन झाल्यानंतर त्यांचे सिस्टर मेरी टेरेसा असे नामकरण करण्यात आले. पुढे आपले संपुर्ण जीवन गरीब आणि असाहय्य लोकांच्या मदतीकरता त्या व्यतीत करत्या झाल्या.


⛲ *मदर टेरेसा यांचे भारतात आगमन*

                    मदर टेरेसा आपल्या इन्स्टीटयुट मधील इतर नन समवेत 1929 साली भारतातील दार्जिलींग येथे आल्या. या ठिकाणी नन या रूपात त्यांनी पहिल्यांदा धार्मिक प्रतिज्ञा घेतली. त्यानंतर त्यांना कलकत्ता येथे शिक्षीका म्हणुन पाठविण्यात आले. कलकत्ता येथे डबलिनच्या सिस्टर लोरेंटो यांनी संत मैरी स्कूल ची स्थापना केली होती. मदर टेरेसा याठिकाणी गरीब आणि असाहय्य मुलांना शिकवीत असत. त्यांचे हिंदी आणि बंगाली या दोन्ही भाषांवर चांगले प्रभुत्व होते. सुरूवातीपासुनच त्या अत्यंत मेहनती होत्या त्यामुळे त्यांनी हे काम देखील अत्यंत प्रामाणिकतेने आणि निष्ठापुर्वक केले, त्या विद्यार्थ्यांच्या आवडत्या शिक्षीका झाल्या. या दरम्यान त्यांच लक्ष आजुबाजुला पसरलेल्या गरीबी, अनारोग्य, लाचारी, व अज्ञानावर गेलं. ते पाहुन त्या अत्यंत दुःखी झाल्या. हा तो काळ होता जेव्हां दुष्काळामुळे कलकत्ता शहरात मोठया संख्येने मृत्यु होत होते व गरिबीमुळे तेथील जनतेची परिस्थीती अत्यंत हालाखीची झाली होती. हे पाहुन मदर टेरेसा यांनी गरीब, असाहाय्य, आजारी आणि गरजवंतांची सेवा करण्याचा निश्चय केला.


💒 *मिशनरी ऑफ चॅरीटी ची स्थापना*

              गरीब आणि गरजवंतांची मदत करण्याच्या हेतुने मदर टेरेसा यांनी पटना येथील होली फॅमिली हॉस्पीटल मधुन नर्सिंग चे प्रशिक्षण पुर्ण केले व पुढे 1948 ला कलकत्ता येथे येऊन त्यांनी स्वतःला गरीब, असाहाय्य आणि वृध्द लोकांच्या सेवेत झोकुन दीलं. खुप प्रयत्नांनंतर 7 ऑक्टोबर 1950 ला मदर टेरेसा यांना समाजाच्या हिताकरीता कार्य करणारी मिशनरी ऑफ चॅरिटी ही संस्था स्थापन करण्याची परवानगी देण्यात आली. मदर टेरेसा यांच्या या संस्थेचा उद्देश केवळ गरीब, गरजवंत, रूग्णं, आणि लाचारांची सहाय्यता करणे आणि त्यांच्यात जगण्याची आस निर्माण करणे हाच होता. या व्यतिरीक्त करूणाहृदयी मदर टेरेसा यांनी ’निर्मल हृदय’ आणि ’निर्मला शिशु भवन’ नावाचे आश्रम सुरू केले. या आश्रमात गरीब आणि आजारी रूग्णांवर उपचार केले जात असत आणि अनाथ व बेघर मुलांची मदत केली जात असे.


👰 *मदर टेरेसा यांचे निधन*

            मदर टेरेसा यांना आपल्या आयुष्याच्या अखेरच्या काळात आरोग्याच्या अनेक समस्यांचा सामना करावा लागला. 1983 साली ज्यावेळी त्या रोम ला पॉप जॉन पॉल व्दितीय यांच्या भेटीकरता गेल्या तेंव्हा त्यांना पहिल्यांदा हृदयविकाराचा झटका आला. त्यानंतर पुन्हा 1989 साली हृदयविकाराचा झटका आला तरी देखील त्यांनी त्यांचे सेवाकार्य सुरूच ठेवले. त्यानंतर मात्र त्यांची प्रकृती ढासळतच गेली, 1991 ला त्यांना किडनी आणि हृदयाचा त्रास सुरू झाला. 1997 ला मदर टेरेसा यांनी मिशनरीज ऑफ चॅरिटी च्या प्रमुख पदावरून निवृत्ती घेतली व 5 सप्टेंबर 1997 ला कलकत्ता येथे अखेरचा श्वास घेतला. अश्या त-हेने या करूणाहृदयी आत्म्याने या जगाचा निरोप घेतला.


🏅 *सन्मान/पुरस्कार* 

                         निस्वार्थ भावनेने गरीब असाहाय्य लोकांची सेवा केल्याबद्दल त्यांना अनेक पुरस्कारांनी सन्मानित करण्यात आलं. त्यांच्या मानवतेच्या सेवेला पाहुन भारत सरकारने त्यांना 1962 साली पद्मश्री पुरस्काराने गौरविलं. पुढे त्यांना देशातील सर्वोच्च असा ’भारतरत्न ’ हा पुरस्कार देऊन सन्मानित करण्यात आलं. या व्यतिरीक्त त्यांना मानव कल्याणार्थ केलेल्या उत्कृष्ट कार्याकरीता 1979 ला नोबेल शांतता पुरस्कार देण्यात आला. या दयासागर हृदयाच्या मातेने नोबेल पुरस्काराची 192,000 डाॅलर धनराशी देखील गरीबांच्या मदतीकरता उपयोगात आणली. याशिवाय 1985 साली त्यांना मेडल ऑफ फ्रीडम अवार्ड ने देखील गौरवान्वित करण्यात आले. मदर टेरेसा यांनी मानव कल्याणाकरता ज्या निस्वार्थ भावनेने कार्य केलं ते खरोखर तारीफ ए काबिल आहे. सर्वांनीच मदर टेरेसा यांच्याकडुन परोपकार, दया, सेवा, यांची प्रेरणा घेण्याची आवश्यकता आहे. या महान आत्म्याला ज्ञानी पंडित च्या संपुर्ण


        

पद्मश्री नरेंद्र अच्युत दाभोलकर



       *पद्मश्री नरेंद्र अच्युत दाभोलकर*


      *जन्म : १ नोव्हेंबर १९४५*

                    (सातारा)

     *मृत्यू : २० ऑगस्ट २०१३*

                    ( पुणे )


मृत्यूचे कारण : अज्ञातच मारेकऱ्यांनी डोक्यात गोळ्या घालून हत्या केली


राष्ट्रीयत्व: भारतीय

नागरिकत्व : भारतीय

प्रशिक्षणसंस्था : मिरज वैद्यकीय 

                        महाविद्यालय

पेशा : वैद्यकीय

प्रसिद्ध कामे : अंधश्रद्धा निर्मूलन 

                      समिती

मूळ गाव : सिंधुदुर्ग जिल्ह्यातील 

                दाभोली

ख्याती : साधना (साप्ताहिक)

पदवी हुद्दा : संपादक

           *कार्यकाळ*

१ मे १९९८ पासून मरेपर्तयंत

पूर्ववर्ती : वसंत बापट

धर्म : हिंदू

जोडीदार : शैला

अपत्ये : मुक्ता दाभोलकर पटवर्धन  

           (कन्या); डॉ. हमीद(पुत्र)

वडील : अच्युत लक्ष्मण दाभोलकर

आई : ताराबाई अच्युत दाभोलकर

नातेवाईक : डॉ. देवदत्त दाभोलकर 

                  (बंधू)


नरेंद्र अच्युत दाभोलकर  हे मराठी बुद्धिवादी, विज्ञानवादी, समाजसुधारक व सामाजिक कार्यकर्ते होते. त्यांनी अंधश्रद्धांच्या निर्मूलनासाठी इ.स. १९८९ साली समविचारी कार्यकर्त्यांना जमवून महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती ही संघटना स्थापली.ते स्वत या संघटनेचे अध्यक्ष होते. नरेन्द्र दाभोलकर यानच 20 औगस्त्त् 2013 रोजी पुणे या  ठिकाणी खून झाला.


💁‍♂ *जीवन*

वडील अच्युत लक्ष्मण दाभोलकर व आई ताराबाई यांच्या दहा अपत्यांपैकी नरेंद्र हे सर्वात धाकटे होय. त्यांचा जन्म सातारा जिल्ह्यातील माहुली या गावी झाला. सुप्रसिद्ध तत्त्वचिंतक कै. डॉ. देवदत्त दाभोळकर हे त्यांचे सर्वात थोरले बंधू होते. दाभोलकरानी शैला यांच्या बरोबर विवाह केला त्याना मुक्ता आणि हामिद हि दोन मुले आहेत. सामाजिक कार्यकर्ते  हामिद दलवाई ह य नावावरून त्यानि आपल्या मुलाचे नाव हामिद ठेवले .लग्न सोहळा व त्या मधील खर्च यावर ते सतत टिका करीत . आपल्या दोन्ही मुलानच विवाह त्यानि साध्या पद्धतीने केला.


🎓 *शिक्षण*

नरेंद्र दाभोलकरांचे माध्यमिक शिक्षण साताऱ्यातील न्यू इंग्लिश स्कूल शाळेत झाले. त्यांनी सांगलीतील विलिंग्डन महाविद्यालयातून विज्ञान शाखेतील उच्च माध्यमिक शिक्षण पूर्ण केले. ते राष्ट्रीय-आंतरराष्ट्रीय स्तरावरचे उत्तम कबड्डीपटू म्हणून क्रीडाजगतात प्रसिद्ध होते. कबड्डीवर उपलब्ध असलेले एकमेव शास्त्रशुद्ध पुस्तकही त्यांनी लिहिले. कबड्डीतील योगदानासाठी त्यांना मानाचा शिवछत्रपती पुरस्कारही मिळाला. इ.स. १९७० साली मिरज वैद्यकीय महाविद्यालयातून वैद्यकीय शाखेचे शिक्षण पूर्ण केले व त्यानंतर त्यांनी सातारा यथे वैद्यकीय व्यवसाय सुरू केला.


🔰 *सामाजिक कार्य*

बाबा आढाव यांच्या एक गाव - एक पाणवठा या चळवळीत दाभोलकर यांचा सक्रिय सहभाग होता. त्यानंतर त्यांनी श्याम मानव यांच्या इ.स. १९८२ साली स्थापन झालेल्या अखिल भारतीय अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती मध्ये कार्य सुरू केले. पण नंतर इ.स. १९८९ मध्ये त्यापासून वेगळे होऊन त्यांनी महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती स्थापन केली. साने गुरुजींनी स्थापन केलेल्या साधना या लोकप्रिय साप्ताहिकाचे ते डिसेंबर २००६पासून मृत्यूपर्यंत संपादक होते.


🌀 *अंधश्रद्धेविरोधात आयुष्यभर लढा*

महाराष्ट्र अंधश्रद्धा निर्मूलन समितीच्या माध्यमातून समाजातील अंधश्रद्धा, अनिष्ट रुढी, परंपरा मोडीत काढण्यासाठी लोकप्रबोधन करण्यात येते. महाराष्ट्र जादूटोणाविरोधी विधेयक विधिमंडळात मंजूर व्हावे, यासाठी दाभोलकर गेल्या काही वर्षांपासून कार्यरत होते. यासंदर्भात सातत्याने विविध राजकीय पक्षांच्या नेत्यांची भेट घेऊन विधेयकाच्या बाजून सर्वपक्षीय मत बनवण्याचे काम ते करीत होते. समाजातील अनेक भोंदू बाबांचे पितळ दाभोलकर आणि अंधश्रद्धा निर्मूलन समितीच्या कार्यकर्त्यांनी सप्रयोग उघडे केले होते. 


📚 *साहित्य*

अंधश्रद्धा : प्रश्नचिन्ह आणि पूर्णविराम - राजहंस प्रकाशन

अंधश्रद्धा विनाशाय - राजहंस प्रकाशन

ऐसे कैसे झाले भोंदू - मनोविकास प्रकाशन

ज्याचा त्याचा प्रश्न (अंधश्रद्धा या विषयावरील नाटक - लेखक : अभिराम भडकमकर). या नाटकाचे साडेचारशेहून अधिक प्रयोग झाले आहेत.

झपाटले ते जाणतेपण - संपादक नरेंद्र दाभोळकर व विनोद शिरसाठ.

ठरलं... डोळस व्हायचंय - मनोविकास प्रकाशन

तिमिरातुनी तेजाकडे - राजहंस प्रकाशन

दाभोलकरांच्या दहा भाषणांची सी.डी.

प्रश्न तुमचे उत्तर दाभोलकरांचे - डी.व्ही.डी, निर्माते - मॅग्नम ओपस कंपनी.

प्रश्न मनाचे (सहलेखक डॉ हमीद दाभोलकर) - राजहंस प्रकाशन

भ्रम आणि निरास - राजहंस प्रकाशन

मती भानामती- राजहंस प्रकाशन (सहलेखक माधव बावगे)

विचार तर कराल? - राजहंस प्रकाशन

विवेकाची पताका घेऊ खांद्यावरी - दिलीपराज प्रकाशन

श्रद्धा-अंधश्रद्धा - राजहंस प्रकाशन (इ.स. २००२)


🏤 *दाभोलकरांच्या संस्था*

अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती

परिवर्तन

साधना (साप्ताहिक)


⌛ *मृत्यू*

नरेंद्र दाभोलकर यांची २० ऑगस्ट, २०१३ मंगळवारी सकाळी साडेसात वाजता पुण्यातील बालगंधर्व रंगमंदिरानजिक असलेल्या महर्षी शिंदे पुलावर (प्रचलित नाव ओंकारेश्वर पूल) अज्ञातांनी ४ गोळ्या झाडून हत्या केली. पुण्यामध्ये असताना ते रोज सकाळी घरापासून ते बालंगधर्व रंगमंदिरापर्यंत फिरायला जात असत.


मंगळवार २० ऑगस्ट, २०१३ रोजी सकाळी घरून निघाल्यावर दाभोलकर शिंदे पुलावरून रस्त्याच्या ओंकारेश्वर मंदिराच्या विरुद्ध बाजूला असलेल्या कडेने साधना साप्ताहिक कार्यालयाच्या दिशेने निघाले होते. पुलावर असताना सकाळी साडेसातच्या सुमारास त्यांच्यावर दोन अज्ञात हल्लेखोऱांनी चार गोळ्या झाडल्या. एक गोळी त्यांच्या पाठीच्या बाजूला लागली, एक चुकीच्या दिशेने गेली. चार गोळ्यांपैकी दोन गोळ्या त्यांच्या डोक्याला लागल्यामुळे दाभोलकर घटनास्थळीच कोसळले .

गोळीबार केल्यावर हल्लेखोर स्प्लेंडर दुचाकीवरून पळून गेले. हल्लेखोर २५ ते ३० वयोगटातील होते. हल्लेखोरांपैकी एकाने टोपी घातली होती आणि दुसऱ्याच्या पाठीवर बॅग होती. घटना घडल्यावर हल्लेखोर रविवार पेठेच्या दिशेने पळून गेल्याचे पोलिसांनी सांगितले. एका प्रत्यक्षदर्शीने ही घटना बघितल्यावर पोलिसांना त्याबद्दल माहिती दिली.


पोलिसांनी दाभोलकरांना ससून रुग्णालयात हलविले. ससून रुग्णालयातील डॉक्टरांनी त्यांना मृत घोषित केले. दाभोलकर यांच्या शर्टच्या खिशामध्ये एक छायाचित्र आणि दोन धनादेश होते. त्यापैकी एका धनादेशावर दाभोलकर यांचे नाव लिहिले होते, असे पोलिसांनी सांगितले

छायाचित्रावरून आणि साधना साप्ताहिकाच्या काही कार्यकर्त्यांनी ओळख पटविल्यावर पोलिसांनी नरेंद्र दाभोलकर यांची हत्या झाल्याचे घोषित केले. 


🎖 *पुरस्कार*

अमेरिकेतील महाराष्ट्र फाउंडेशनने त्यांच्यातर्फेचा पहिला समाजगौरव पुरस्कार ’अंधश्रद्धा निर्मूलन समिती’ला दिला होता.

समाज गौरव पुरस्कार- रोटरी क्‍लब

दादासाहेब साखवळकर पुरस्कार

शिवछत्रपती पुरस्कार - कबड्डी

शिवछत्रपती युवा पुरस्कार - कबड्डी

पुणे विद्यापीठाचा साधना जीवनगौरव पुरस्कार (मरणोत्तेर)

भारत सरकारचा पद्मश्री पुरस्कार (मरणोत्तर)


🏆 *दाभोलकरांच्या नावाचे*

 *पुरस्कार*

अमेरिकेतील न्यूयॉर्कच्या महाराष्ट्र फाउंडेशनने २०१३सालापासून समाजहितार्थ एखाद्या कार्यात वाहून घेणाऱ्या व्यक्तीला डॉ. नरेंद्र दाभोलकर स्मृती पुरस्कार सुरू केला आहे. पहिल्याच वर्षी हा पुरस्कार महाराष्ट्र नॉलेज कॉर्पोरेशन लिमिटेड (MKCL)चे व्यवस्थापकीय संचालक विवेक सावंत यांना जाहीर झाला आहे.


📚 *दाभोलकरांच्या हत्येच्या घटनाक्रमावरील पुस्तके*

 

📙 *दाभोळकरचे भूत*

श्याम पेठकर यांनी लिहिलेले दाभोळकरचे भूत या नावाचे एक नाटक हरीष इथापे यांनी दिग्दर्शित केले होते. समीर पंडित यांनी नाटकाची निर्मिती केली होती, आणि वैदर्भीय कलावंतांनी ते रंगभूमीवर आणले होते.


🙋‍♂ *उत्तर दाभोलकरांचे (पुस्तिका)*

अंधश्रद्धा निर्मूलन समितीचे कार्याध्यक्ष (कै.) डॉ. नरेंद्र दाभोलकर यांची सविस्तर मुलाखात त्‍यांच्या हत्येच्या तीन वर्षे आधी ‘प्रश्‍न तुमचा; उत्तर दाभोलकरांचे’ या शीर्षकांतर्गत झाली होती. श्रोत्यांच्या विविध शंकांचे त्यांनी नेमक्‍या शब्दांत निरसन केले होते. विनोद शिरसाठ यांनी ही मुलाखत घेतली होती. या मुलाखतीतल्या निवडक प्रश्‍नांचे संकलन या पुस्तिकेत करण्यात आले आहे.

         

अहिल्याबाई होळकर

                                   


         *पुण्यश्लोक राजमाता*

         *अहिल्याबाई होळकर*


        *जन्म : ३१ मे  १७२५*

(चौंडीगाव , जामखेडतालुका, अहमदनगर , महाराष्ट्र, भारत)

       *मृत्यू : १३ ऑगस्ट १७९५*

                   ( महेश्वर 

पूर्ण नाव : अहिल्याबाई खंडेराव

                 होळकर

पदव्या : पुण्यश्लोक

अधिकारकाळ : ११ डिसेंबर १७६७ - १३ ऑगस्ट  १७९५

राज्याभिषेक : ११ डिसेंबर १७६७

राज्यव्याप्ती : माळवा

राजधानी : इंदोर

पूर्वाधिकारी : खंडेराव होळकर

दत्तकपुत्र : तुकोजीराव होळकर

उत्तराधिकारी : तुकोजीराव

                      होळकर

वडील : माणकोजी शिंदे

राजघराणे : होळकर

🎠 *जीवन*

              अहिल्यादेवींचा जन्म मे ३१ इ.स. १७२५ रोजी महाराष्ट्राच्या अहमदनगर जिल्ह्यातील जामखेड तालुक्यातील चौंडी या खेड्यात झाला. त्यांचे वडील माणकोजी शिंदे हे त्या गावचे पाटील होते. अहिल्यादेवी यांचे आजोळ उस्मानाबाद जिल्ह्यातील चोराखळी हे गांव होते. त्यांच्या मामांचे आडनाव मैंदाड होते. स्त्रीशिक्षण फारसे प्रचलित नसतानाही तिच्या वडिलांनी त्यांना लिहिण्या वाचण्यास शिकवले होते.

               बाजीराव पेशव्यांचे एक सरदार मल्हारराव होळकर हे माळवा प्रांताचे जहागीरदार होते. ते पुण्यास जाताना चौंडीस थांबले होते. आख्यायिकेनुसार, ८ वर्षाच्या अहिल्यादेवींना, मल्हाररावांनी एका देवळात बघितले. मुलगी आवडल्यामुळे त्यांनी तिला, स्वतःचा मुलगा खंडेराव याची वधू म्हणून आणले.

              मल्हारराव होळकरांच्या त्या सून होत. अहिल्यादेवींचे पती खंडेराव होळकर हे इ.स. १७५४ मध्ये कुम्हेरच्या लढाईत धारातीर्थी पडले. त्यांच्या मृत्यूनंतर सासरे मल्हाररावांनी अहिल्याबाईंना सती जाऊ दिले नाही. १२ वर्षांनंतर, मल्हारराव होळकर हेही मृत्यू पावले. त्यानंतर अहिल्याबाई मराठा साम्राज्याच्या माळवा प्रांताचा कारभार बघू लागल्या. त्या लढाईत अहिल्यादेवी स्वतः सैन्याचे नेतृत्व करीत होत्या. पुढे त्यांनी तुकोजीराव होळकर यांची सेनापती म्हणून नेमणूक केली.

              एका इंग्रजी लेखकाने अहिल्यादेवी होळकर, यांना भारताच्या "कॅथरीन द ग्रेट, एलिझाबेथ, मार्गारेट" म्हटले आहे. इंग्रजी लेखक लॉरेन्स यांनी अहिल्याबाई यांची तुलना रशियाची राणी कथेरीन , इंग्लंडची राणी एलिझाबेथ तसेच डेन्मार्कची राणी मार्गारेट यांच्याशी केली आहे.

          ह्या भारतातील, माळव्याच्या जहागीरदार असलेल्या होळकर घराण्याच्या 'तत्त्वज्ञानी राणी' म्हणून ओळखल्या जातात. त्यांनी नर्मदातीरी, इंदूरच्या दक्षिणेस असलेल्या महेश्वर या ठिकाणी आपली राजधानी हलविली. मल्हाररावांनी त्यांना प्रशासकीय व सैन्याच्या कामात पारंगत केलेल होते. त्या आधाराने अहिल्याबाईंनी इ.स. १७६६ ते इ.स. १७९५, म्हणजे त्यांच्या मृत्यूपर्यंत माळव्यावर राज्य केले.

             अहिल्याबाई होळकर या उचित न्यायदानासाठी प्रसिद्ध होत्या.

          राणी अहिल्यादेवी यांनी भारतभरात अनेक हिंदू मंदिरे व नदीघाट बांधले, किंवा त्यांचा जीर्णोद्धार केला; महेश्वर व इंदूर या गावांना सुंदर बनवले. त्या अनेक देवळांच्या आश्रयदात्या होत्या. त्यांनी अनेक तीर्थक्षेत्री धर्मशाळांचे बांधकाम केले. त्यांत द्वारका, काशी, उज्जैन, नाशिक व परळी वैजनाथ यांचा प्रामुख्याने समावेश आहे. वेरावळ येथील सोमनाथचे गझनीच्या महंमदाने ध्वस्त केलेले देऊळ बघून अहिल्यादेवींनी शेजारीच एक शंकराचे एक देऊळ बांधले. सोमनाथला जाणारे लोक या देवळालाही भेट देतात बाईंंना प्रजेस कल्याणकारी असे काम करण्याची आवड होती.

👸🏻 *शासक*

               इ.स. १७६५ मध्ये सत्तेसाठी झालेल्या एका लढाईदरम्यान लिहिलेल्या एका पत्रावरून मल्हाररावांचा अहिल्याबाईंच्या कर्तृत्वावर किती विश्वास होता हे दिसून येते.

          "चंबळ पार करून ग्वाल्हेर येथे जावा. तेथे तुम्ही ४-५ दिवस मुकाम करू शकता.तुम्ही मोठे सैन्य ठेवू शकता व त्यांचे शस्त्रांसाठी योग्य तजवीज करा.....कूच करतांना,मार्गावर तुम्ही सुरक्षेसाठी चौक्या लावा."

              पूर्वीच शासक म्हणून तरबेज झाल्यामुळे, मल्हारराव व मुलाच्या मृत्यूनंतर, अहिल्यादेवींनी स्वतःलाच राज्यकारभार पाहू देण्याची अनुज्ञा द्यावी अशी पेशव्यांना विनंती केली. त्यांनी शासन करण्यास माळव्यात अनेकांचा विरोध होता, पण होळकरांचे सैन्य अहिल्याबाईंच्या नेतृत्वाखाली काम करण्यास उत्सुक होते. अहिल्यादेवी सैनिकी कवायतीत हत्तीच्या हौद्याच्या कोपऱ्यात चार धनुष्य आणि बाणांचे भाते ठेवत असत, असे म्हणतात.

                 पेशव्यांनी परवानगी दिल्यावर, ज्या माणसाने तिला विरोध केला होती त्यास चाकरीत घेऊन, तुकोजीराव होळकर (मल्हाररावांचा दत्तक पुत्र) यास सैन्याचा मुख्य करून, अहिल्यादेवी होळकरांनी पूर्ण दिमाखात माळव्यास प्रयाण केले. अहिल्यादेवींनी पडदा प्रथा कधीच पाळली नाही. त्या रोज जनतेचा दरबार भरवीत असत व लोकांची गाऱ्हाणी ऐकण्यास नेहमीच उपलब्ध असत. जरी राज्याची राजधानी ही नर्मदातीरावर असलेल्या महेश्वर येथे होती तरीही, इंदूर या खेड्याचा विकास करून त्याचे सुंदर मोठ्या शहरात रूपांतर करणे, हे अहिल्यादेवींनी केलेले फार मोठे काम होते. त्यांनी माळव्यात रस्ते व किल्ले बांधले, अनेक उत्सव भरवले, हिंदू मंदिरांमध्ये कायमस्वरूपी पूजा सुरू रहावी म्हणून अनेक दाने दिली. माळव्याबाहेरही त्यांनी मंदिरे, घाट, विहिरी, तलाव व धर्मशाळा बांधल्या.

           भारतीय संस्कृती कोशात अहिल्यादेवी होळकरांनी केलेल्या बांधकामांची यादी आहे- काशी, गया, सोमनाथ,अयोध्या, मथुरा, हरिद्वार, कांची, अवंती, द्वारका, बद्रीकेदार, रामेश्वर व जगन्नाथपुरी वगैरे. अहिल्यादेवींस, सावकार, व्यापारी, शेतकरी इत्यादी आर्थिकदृष्ट्या सुदृढ झालेले बघून आनंद होत असे. परंतु त्यांनी त्यांच्यावर आपला अधिकार असल्याचे कधीच जाणवू दिले नाही. त्यांनी सर्व राज्यकारभार हा सुखी व धनाढ्य लोकांकडून नियमांतर्गत मिळालेल्या धनापासून चालविला होता, असे दिसते.

          अहिल्यादेवींनी जनतेच्या/रयतेच्या काळजीपोटी अनेक गोष्टी केल्या. त्यांनी अनेक विधवांना पतीची मिळकत त्यांच्या पाशीच ठेवण्यात मदत केली. अहिल्यादेवींच्या राज्यात कोणीही विधवा मुलाला दत्तक घेऊ शकत असे. एकदा त्यांच्या एका मंत्र्याने लाच घेतल्याशिवाय दत्तक घेण्याच्या मंजुरीस नकार दिला, तेव्हा अहिल्यादेवींनी दत्तक विधानाचा कार्यक्रम स्वतः प्रायोजित करून, रीतसर कपडे व दागिन्यांचा आहेर दिला. अहिल्यादेवी होळकरांच्या स्मृतीस अभिवादन म्हणून, सन १९९६ मध्ये, इंदुरातील नागरिकांनी त्यांच्या नावाने एक पुरस्कार सुरू केला. तो, दरवर्षी, जनसेवेचे विशेष काम करणाऱ्यास दिला जातो. भारताच्या पंतप्रधानांनी पहिल्या वर्षी तो पुरस्कार नानाजी देशमुखांना दिला.

         अहिल्याबाई होळकर यांच्या स्मरणार्थ, इंदूर येथील विश्व विद्यालयास त्यांचे नाव दिले आहे. तसेच त्यांचे नावाचे पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर सोलापूर विद्यापीठ हे एक विद्यापीठ सोलापूरला आहे.

               भिल्ल व गोंड या राज्याच्या सीमेवर असलेल्या जमातींमधील वाद अहिल्यादेवी सोडवू शकल्या नाहीत. तरीही, त्यांनी त्या लोकांना पहाडातील निरुपयोगी जमीन दिली आणि त्यांना, त्या क्षेत्रातून जाणाऱ्या सामानावर थोडा 'कर' घेण्याचा अधिकार दिला. याही बाबतीत, (आंग्ल लेखक) 'माल्कम' यांच्यानुसार, अहिल्यादेवींनी 'त्यांच्या सवयींवर लक्ष ठेवले'.

                 महेश्वर येथील अहिल्यादेवींची,  राजधानी ही जणू काव्य, संगीत, कला व उद्योग यांची संस्थाच होती. महाराष्ट्रातील प्रसिद्ध मराठी कवी मोरोपंत व शाहीर अनंतफंदी यांना व संस्कृत विद्वान खुशालीराम यांना अहिल्याबाईंनी आश्रय दिला. कारागरांना, मूर्तिकारांना व कलाकारांना त्यांच्या राजधानीत सन्मान व वेतन मिळत असे. त्यांनी महेश्वर शहरात एक कपड्याची गिरणीपण सुरू केली.

          एकोणीसाव्या व विसाव्या शतकातील भारतीय, इंग्रजी व अमेरिकन इतिहासकार हे मान्य करतात की, अहिल्यादेवी होळकरांस माळवा व महाराष्ट्रात, त्या काळी व आताही, संताचा सन्मान दिला जातो. इतिहासाच्या कोणाही अभ्यासकास ते मत खोडून काढण्याजोगे आजवर काहीही सापडलेले नाही.

🔮  *अहिल्यादेवी यांच्याबद्दलची मते*

        "अहिल्यादेवी एक अतिशय योग्य शासक व संघटक होत्या. मध्य भारताच्या इंदूरमधील त्याचा राज्यकाळ सुमारे तीस वर्षे चालला. हा एक स्वप्नवत काळ होता. या काळात कायद्याचे राज्य होते आणि त्यामुळे त्या काळात जनतेची भरभराट झाली. अहिल्यादेवी होळकरांना जीवनकालात तर सन्मान मिळालाच पण मृत्यूनंतरही लोकांनी त्यांना संताचा दर्जा दिला."

             "ज्याप्रमाणे शिवाजी महाराज हे जसे पुरुषांमधले उत्तम राजे होते, तसेच अहिल्यादेवी ही स्त्रियांमधील उत्तम राज्यकर्ती होती. तिच्या चांगल्या बुद्धीचे, चांगुलपणाचे व गुणांचे उदाहरण देता येऊ शकते. अशी अहिल्यादेवी ही एक महान स्त्री होती."          

                "आपल्या असामान्य कर्तृत्वाने अहिल्यादेवींनी रयतेचे मन जिंकले. नाना फडणवीसांसकट अनेक उच्च धुरीण आणि माळव्यातील लोकांनुसार ती एक दिव्य अवतार होती. ती आजतागायतची सर्वांत शुद्ध व उदाहरण देण्याजोगी शासक होती.

           अलीकडच्या काळातील चरित्रकार अहिल्यादेवींना 'तत्त्वज्ञानी राणी' असे संबोधतात. याचा संदर्भ बहुतेक 'तत्त्वज्ञानी राजा' भोज याच्याशी असावा.

           अहिल्यादेवी होळकर ह्या एक खरोखरीच विस्तृत राजकीय दृश्यपटलाच्या एक सूक्ष्म अवलोकनकर्त्या होत्या. सन १७७२ मध्ये पेशव्यांना लिहिलेल्या एका पत्रात त्यांनी ब्रिटिशांबरोबर हातमिळवणी करण्याबाबत एक ताकीद दिली होती. त्यांना कवटाळणे हे अस्वलास कवटाळण्याजोगे असल्याचे त्यांनी नोंदले आहे. " वाघासारखे इतर प्राणी हे शक्ती वा युक्तीने मारले जाऊ शकतात, परंतु अस्वल मारणे हे फारच कठीण असते. सरळ त्याच्या चेहर्‍यावर वार केल्यासच ते मरते. एकदा त्याच्या मजबूत पकडीत सापडल्यावर ते त्याच्या शिकारीस, गुदगुल्या करून ठार मारते. असाच इंग्रजांचा मार्ग आहे. हे बघता, त्यांच्यावर मात करणे कठीण आहे.

          "या इंदूरमधील शासकांनी, त्यांच्या अखत्यारीत असलेल्या सर्वांस चांगले काम करण्यास प्रोत्साहन दिले. व्यापाऱ्यांनी चांगल्या कपड्यांचे उत्पादन केले, व्यापार वाढला, शेतकरी हे शांततेत व दबावरहित होते. कोणतेही प्रकरण राणीच्या निदर्शनास आले की ते कडकपणे हाताळले जाई. अहिल्यादेवीना आपल्या प्रजेचा उत्कर्ष आवडत असे. तसेच ती प्रजा राजा हिसकावून घेईल म्हणून आपली संपत्ती उघड करण्यास घाबरत नाही, हे बघणे आवडत असे. दूरदूरपर्यंत, रस्त्यांच्या कडेला, दाट छायादार वृक्ष लावण्यात आले होते, विहिरी केल्या होत्या, पथिकांसाठी विश्रांतीगृहे. गरीब ,घर नसलेले व अनाथ या सर्वांना त्यांच्या जरुरीनुसार, सर्व मिळत होते. बहुत काळापासून, भिल्ल लोक पहाडांतून सामानाची ने-आण करत असतांना लूटमार करीत असत. अहिल्याबाईंनी त्यांना त्यातून मुक्ती मिळवून दिली व प्रामाणिकपणे शेती करण्याची संधी त्यांना देऊ केली. सर्व समाजाला अहिल्यादेवी आवडत असत आणि तो त्यांच्या उदंड आयुष्याची प्रार्थना करी. त्यांच्या कन्येने तिचा पती, यशवंतराव फानसे यांच्या मृत्यूनंतर सती जाणे हे अहिल्यादेवींच्या आयुष्यातले शेवटचे सर्वात मोठे दुःख होते.

          वयाच्या ७०व्या वर्षी अहिल्यादेवी होळकरांची प्राणज्योत निमाली.

             भारत स्वतंत्र झाल्यावरही पुढील अनेक वर्षे शेजारील भोपाळ, जबलपूर किंवा ग्वाल्हेर या शहरांपेक्षा इंदूर सर्व बाबतीत प्रगतीशील राहिले. याच्या मागे अहिल्यादेवीची दूरदृष्टी होती.

             अहिल्यादेवीच्या सन्मान व स्मृतिप्रीत्यर्थ भारत सरकारने २५ ऑगस्ट १९९६ या दिवशी एक डाक तिकिट जारी केले.

             या अशा शासनकर्तीस मानवंदना म्हणून इंदूरच्या विमानतळाचे नाव   "देवी अहिल्याबाई विमानतळ" असे ठेवण्यात आले आहे, आणि इंदूर विद्यापीठास "देवी अहिल्या विश्वविद्यालय" असे नाव देण्यात आले आहे".

                   तसेच महाराष्ट्रातील सोलापूर विद्यापीठाचे नामकरण पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर सोलापूर विद्यापीठ असे करण्यात आले आहे.

🏤 *होळकर यांची देशभरातील कामे*

अकोले तालुका- विविध ठिकाणी विहिरी उदा. वाशेरे, वीरगाव, औरंगपूर.

अंबा गाव – दिवे.

अमरकंटक (मप्र)- श्री विघ्नेश्वर, कोटितीर्थ, गोमुखी, धर्मशाळा व वंश कुंड

अलमपूर (मप्र) – हरीहरेश्वर, बटुक, मल्हारीमार्तंड, सूर्य, रेणुका,राम, हनुमानाची मंदिरे, लक्ष्मीनारायणाचे,मारुतीचे व नरसिंहाचे मंदिर, खंडेराव मार्तंड मंदिर व मल्हाररावांचे स्मारक

आनंद कानन – श्री विघ्नेश्वर मंदिर.

अयोध्या (उ.प्र.)– श्रीरामाचे मंदिर, श्री त्रेता राम, श्री भैरव, नागेश्वर/सिद्धार्थ मंदिरे, शरयू घाट, विहिरी, स्वर्गद्वारी मोहताजखाना, अनेक धर्मशाळा.

आमलेश्वर, त्र्यंबकेश्वर मंदिरांचा जीर्णोद्धार

उज्जैन (म.प्र.)– चिंतामणी गणपती,जनार्दन,श्री लीला पुरुषोत्तम,बालाजी तिलकेश्वर,रामजानकी रस मंडळ,गोपाल,चिटणीस,बालाजी,अंकपाल,शिव व इतर अनेक मंदिरे,१३ घाट,विहिरी व अनेक धर्मशाळा इत्यादी.

ओझर (अहमदनगर) (महाराष्ट्र) – २ विहिरी व कुंड.

इंदूर – अनेक मंदिरे व घाट

ओंकारेश्वर (मप्र) – मामलेश्वर महादेव,

कर्मनाशिनी नदी – पूल

काशी (बनारस) – काशी विश्वनाथ,श्री तारकेश्वर, श्री गंगाजी, अहिल्या द्वारकेश्वर, गौतमेश्वर व अनेक महादेव मंदिरे, मंदिरांचे घाट, मनकर्णिका, दशास्वमेघ, जनाना, अहिल्या घाट, उत्तरकाशी, रामेश्वर पंचक्रोशी, कपिलधारा धर्मशाळा, शीतल घाट.

केदारनाथ – धर्मशाळा व कुंड

कोल्हापूर(महाराष्ट्र) – मंदिर-पूजेसाठी साहाय्य.

कुम्हेर – विहीर व राजपुत्र खंडेरावांचे स्मारक.

कुरुक्षेत्र (हरयाणा) - शिव शंतनु महादेव मंदिरे,पंचकुंड व लक्ष्मीकुंड घाट.

गंगोत्री –विश्वनाथ, केदारनाथ, अन्नपूर्णा, भैरव मंदिरे, अनेक धर्मशाळा.

गया (बिहार) – विष्णुपद मंदिर.

गोकर्ण – रावळेश्वर महादेव मंदिर, होळकर वाडा, बगीचा व गरीबखाना.

घृष्णेश्वर (वेरूळ) (महाराष्ट्र) – शिवालय तीर्थ.

चांदवड वाफेगाव(महाराष्ट्र) – विष्णु व रेणुकेचे मंदिर.

चिखलदा – अन्नछत्र

चित्रकूट (उ.प्र.) - श्रीरामचंद्राच्या मूर्तीची प्राणप्रतिष्ठा

चौंडी – चौडेश्वरीदेवी मंदिर, सिनेश्वर महादेव मंदिर, अहिल्येश्वर मंदिर, धर्मशाळा व घाट

जगन्नाथपुरी (ओरिसा) – श्रीरामचंद्र मंदिर, धर्मशाळा व बगीचा

जळगांव(महाराष्ट्र) - राम मंदिर

जांबगाव – रामदासस्वामी मठासाठी दान

जामघाट – भूमिद्वार

जेजुरी(महाराष्ट्र) – मल्हार गौतमेश्वर, विठ्ठल, मार्तंड मंदिरे, जनाई महादेव व मल्हार या नावाचे तलाव.

टेहरी (बुंदेलखंड) – धर्मशाळा.

तराना – तिलभांडेश्वर शिव मंदिर, खेडपती, श्रीराम मंदिर, महाकाली मंदिर.

त्र्यंबकेश्वर (नाशिक) (महाराष्ट्र)– कुशावर्त घाटावर पूल.

द्वारका(गुजरात) – मोहताजखाना, पूजागृह व पुजार्‍यांना काही गावे दान.

श्री नागनाथ (दारुकावन) – १७८४मध्ये पूजा सुरू केली.

नाथद्वार – अहिल्या कुंड, मंदिर, विहीर.

निमगाव (नाशिक) (महाराष्ट्र)– विहीर.

नीलकंठ महादेव – शिवालय व गोमुख.

नैमिषारण्य (उ.प्र.) – महादेव मंडी, निमसर धर्मशाळा, गो-घाट, चक्रीतीर्थ कुंड.

नैम्बार (मप्र) – मंदिर

पंचवटी (नाशिक)(महाराष्ट्र)– श्री राम मंदिर, गोरा महादेव मंदिर, विघ्नेश्वर मंदिर, धर्मशाळा, रामघाट.

पंढरपूर(महाराष्ट्र) – श्री राम मंदिर, तुळशीबाग, होळकर वाडा, सभा मंडप ,धर्मशाळा व मंदिरास चांदीची भांडी दिली.

पिंपलास (नाशिक) (महाराष्ट्र)– विहीर.

पुणतांबे(महाराष्ट्र) – गोदावरी नदीवर घाट.

पुणे (महाराष्ट्र) – घाट 

पुष्कर – गणपती मंदिर, मंदिरे, धर्मशाळा व बगीचा.

प्रयाग (अलाहाबाद,उ.प्र.) - विष्णु मंदिर, घाट व धर्मशाळा, बगीचा, राजवाडा.

बद्रीनारायण (उ.प्र.) –श्री केदारेश्वर मंदिर, हरिमंदिर, अनेक धर्मशाळा (रंगदचाटी, बिदरचाटी, व्यासंग, तंगनाथ, पावली) मनु कुंड (गौरकुंड व कुंडछत्री), देवप्रयाग येथील बगीचा व गरम पाण्याचे कुंड, गायींच्या चरण्यासाठी कुरणे.

बऱ्हाणपूर (मप्र) – घाट व कुंड.

बिठ्ठूर – ब्रह्मघाट

बीड (महाराष्ट्र)– घाटाचा जीर्णोद्धार.

बेल्लूर (कर्नाटक) – गणपती, पांडुरंग, जलेश्वर, खंडोबा, तीर्थराज व अग्नि मंदिरे, कुंड

भरतपूर – मंदिर, धर्म शाळा व कुंड.

भानपुरा – नऊ मंदिरे व धर्मशाळा.

भीमाशंकर (महाराष्ट्र) - गरीबखाना

भुसावळ (महाराष्ट्र) - चांगदेव मंदिर

मंडलेश्वर – शिवमंदिर घाट

मनसा – सात मंदिरे.

महेश्वर - शंभरावर मंदिरे,घाट व धर्मशाळा व घरे.

मामलेश्वर महादेव – दिवे.

मिरी (अहमदनगर) (महाराष्ट्र) – सन १७८० मध्ये भैरव मंदिर

रामपुरा – चार मंदिरे, धर्मशाळा व घरे.

रामेश्वर (तामिळनाडु) – हनुमान, श्री राधाकृष्णमंदिरे, धर्मशाळा ,विहिर, बगीचा इत्यादी.

रावेर (महाराष्ट्र)– केशव कुंड

वाफेगाव (नाशिक)(महाराष्ट्र) – होळकर वाडा व विहीर.

श्री विघ्नेश्वर – दिवे

वृंदावन (मथुरा) – चैनबिहारी मंदिर, कालियादेह घाट, चिरघाट व इतर अनेक घाट, धर्मशाळा व अन्नछत्र.

वेरूळ(महाराष्ट्र) – लाल दगडांचे मंदिर.

श्री वैजनाथ (परळी,) (महाराष्ट्र)– सन १७८४ मध्ये वैद्यनाथ मंदिराचा जीर्णोद्धार.

श्री शंभु महादेव पर्वत, शिंगणापूर (महाराष्ट्र) – विहीर.

श्रीशैल मल्लिकार्जुन (कुर्नुल, आंध्रप्रदेश) – शिवाचे मंदिर

संगमनेर (महाराष्ट्र)– राम मंदिर.

सप्‍तशृंगी – धर्मशाळा.

संभल (संबळ) – लक्ष्मीनारायण मंदिर व २ विहिरी.

सरढाणा मीरत – चंडी देवीचे मंदिर.

साखरगाव (महाराष्ट्र)– विहीर.

सिंहपूर – शिव मंदिर व घाट

सुलतानपूर (खानदेश) (महाराष्ट्र)– मंदिर

सुलपेश्वर – महादेव मंदिर व अन्नछत्र

सोमनाथ मंदिर, धर्मशाळा, विहिरी.

सौराष्ट्र (गुजरात) – सन १७८५ मध्ये सोमनाथ मंदिर, जीर्णोद्धार व प्राणप्रतिष्ठा.

हरिद्वार (उ.प्र.) – कुशावर्त घाट व मोठी धर्मशाळा.

हांडिया – सिद्धनाथ मंदिरे,घाट व धर्मशाळा

हृषीकेश – अनेक मंदिरे, श्रीनाथजी व गोवर्धन राम मंदिरङ

📚  *प्रकाशित पुस्तके*

▪'अहिल्याबाई' : लेखक - श्री. हिरालाल शर्मा

▪'अहिल्याबाई चरित्र' : लेखक - श्री. पुरुषोत्तम

▪'अहिल्याबाई चरित्र' : लेखक - श्री. मुकुंद वामन बर्वे

▪अहिल्याबाई होळकर - वैचारिक राणी (लेखक : म.ब. कामत व व्ही.बी. खेर)

▪अहिल्याबाई होळकर : लेखक - म.श्री. दीक्षित

▪अहिल्याबाई होळकर (चरित्र), लेखक : खडपेकर

▪कर्मयोगिनी : लेखिका - विजया जहागीरदार

▪पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर (जनार्दन ओक)

▪महाराष्‍ट्राचे शिल्‍पकार - तेजस्विनी 

▪अहिल्‍याबाई होळकर (लेखिका : विजया जहागीरदार; प्रकाशक : महाराष्ट्र सरकार)

▪शिवयोगिनी (कादंबरी, लेखिका - नीलांबरी गानू)

▪'ज्ञात- अज्ञात अहिल्याबाई होळकर' लेखक - विनया खडपेकर


📽 *चित्रपट*

 

            "देवी अहिल्याबाई" या नावाचा एक चित्रपट सन २००२ मध्ये आला होता. त्यात शबाना आझमी हिने हरकूबाईची-(खांडा? राणी, मल्हारराव होळकरांची एक पत्‍नी) भूमिका केली होती. चित्रपटात सदाशिव अमरापूरकर यांची मल्हारराव होळकर (अहिल्याबाईचे सासरे) म्हणून भूमिका होती. 

         अहिल्याबाईच्या जीवनावर इंदूरच्या Educational Multimedia Research Centerने एक २० मिनिटांचा माहितीपट बनवला होता.


      

साहित्यरत्न लोकशाहीर अण्णाभाऊ साठे


         *साहित्यरत्न लोकशाहीर*   

              *अण्णाभाऊ साठे*


*जन्म :  १ ऑगस्ट, १९२०*

            (वाटेगाव, ता. वाळवा,

                           जि. सांगली) 

*मृत्यू :  १८ जुलै, १९६९*

             ( गोरेगाव, मुंबई )


जन्म नाव :  तुकाराम भाऊराव 

                   साठे

टोपणनाव :   अण्णाभाऊ साठे

शिक्षण : अशिक्षित

राष्ट्रीयत्व : भारतीय 

कार्यक्षेत्र : लेखक, साहित्यिक

भाषा : मराठी

साहित्य प्रकार : शाहिर, कथा,    

                       कादंबरीकार

चळवळ : संयुक्त महाराष्ट्र चळवळ

प्रसिद्ध साहित्यकृती : फकिरा

प्रभाव : बाबासाहेब आंबेडकर, 

            कार्ल मार्क्स

वडील :  भाऊराव साठे

आई : वालुबाई साठे

पत्नी : कोंडाबाई साठे,

           जयवंता साठे

अपत्ये : मधुकर, शांता आणि      

             शकुंतला


            तुकाराम भाऊराव साठे हे अण्णाभाऊ साठे म्हणून ओळखले जाणारे एक मराठी समाजसुधारक,  लोककवी आणि लेखक होते. साठे एका अस्पृश्य मांग समाजामध्ये जन्मलेले एक दलित व्यक्ती होते, त्यांची उपज आणि ओळख त्यांचे लेखन आणि राजकीय कृतीशीलतेचे केंद्रबिंदू होते.

       कथा, कादंबरी, लोकनाट्य, नाटक, पटकथा, लावणी, पोवाडे, प्रवासवर्णन अशा वेगवेगळ्या साहित्यप्रकारांतील लेखन केलेले ख्यातनाम मराठी साहित्यिक. ब्रिटिशराज्यकर्त्यांनी ‘गुन्हेगार’ म्हणून शिक्का मारलेल्या एका जमातीत त्यांचा जन्म झाला. त्यांच्या वडिलांचे नाव भाऊ सिधोजी साठे, तर आईचे नाव वालबाई होते. त्यांचे मूळ नाव तुकाराम. जन्मस्थळ वाटेगाव (ता.वाळवा; जि. सांगली ). त्यांचे शालेय शिक्षण झालेले नव्हते; तथापि त्यांनी प्रयत्नपूर्वक अक्षरज्ञान मिळविले. १९३२ साली वडिलांसोबत ते मुंबईला आले. चरितार्थासाठी कोळसे वेचणे, फेरीवाल्यांच्या पाठीशी गाठोडे घेऊन हिंडणे, मुंबईच्या मोरबाग गिरणीत झाडूवाला म्हणून नोकरी, अशी मिळतील ती कामे त्यांनी केली. मुंबईत कामगारांचे कष्टमय, दुःखाचे जीवन त्यांनी पाहिले. त्यांचे संप, मोर्चे पाहून त्यांचा लढाऊपणाही त्यांनी अनुभवला. १९३६ मध्ये भारतीय कम्युनिस्ट पक्षाचे नेते कॉ. श्रीपाद अमृत डांगे यांच्या प्रभावाखाली आल्यावर ते कम्युनिस्ट पक्षाचे क्रियाशील कार्यकर्ते झाले.

        मुंबईत डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरांपासून स्वातंत्र्यवीर सावरकरांपर्यंत अनेक नेत्यांची भाषणे त्यांनी ऐकली. पक्षाचे कामही ते करीत होतेच; तथापि वडिलांच्या निधनानंतर कुटुंबाची सगळी जबाबदारी अंगावर,  पडल्याने ते पुन्हा आपल्या गावी आले. तेथे बापू साठे या चुलतभावाच्या तमाशाच्या फडात ते काम करू लागले. पुढे १९४२ च्या चळवळीत सहभागी झाल्यामुळे ब्रिटिश सरकारने त्यांच्यावर पकडवॉरंट काढले. पोलिसांना चुकवीत ते मुंबईला आले. मुंबईत लोकशाहीर म्हणून त्यांचा लौकिक झाला. त्यावेळी अमर शेख या ख्यातनाम मराठी लोकशाहीरांबरोबर अण्णाभाऊंचेही नाव लोकशाहीर म्हणून गाजू लागले. त्यांनी लिहिलेला ‘स्तालिनग्राडचा पवाडा’ १९४३ साली पार्टी या मासिकात प्रसिद्घ झाला. त्यांनी १९४४ साली शाहीर अमर शेख व गव्हाणकर यांच्या मदतीने ‘लाल बावटा’ कलापथक स्थापन केले. या कलापथकावर सरकारने बंदी घातली. ‘अमळनेरचे अमर हुतात्मे’ आणि ‘पंजाब-दिल्लीचा दंगा’ या त्यांच्या काव्यरचना १९४७ साली प्रसिद्घ झाल्या. ‘पंजाब-दिल्लीचा दंगा’ या रचनेत सर्व प्रागतिक शक्तींना एकत्र येऊन शांतता प्रस्थापित करण्याचे आवाहन त्यांनी केले होते.

         संयुक्त महाराष्ट्राच्या चळवळीत त्यांनी स्वतःला झोकून दिले होते. त्यांच्या शाहिरीत लावणी, पोवाडे, गीते, लोकनाटये आदींचा समावेश होता. ‘महाराष्ट्राची परंपरा’ (१९५०) ह्या नावाने त्यांनी या चळवळीसाठी पोवाडा लिहिला;  त्याचप्रमाणे मुंबई कुणाची ?  ह्या लोकनाट्याचे महाराष्ट्रभर प्रयोग केले. अकलेची गोष्ट (१९४५), देशभक्त घोटाळे (१९४६), शेटजींचे इलेक्शन (१९४६), बेकायदेशीर (१९४७), पुढारी मिळाला (१९५२), लोकमंत्र्यांचा दौरा (१९५२) ही त्यांची अन्य काही लोकनाटये. अण्णाभाऊंनी पारंपरिक तमाशाला आधुनिक लोकनाट्याचे रूप दिले.

           अण्णाभाऊंच्या साहित्यात त्यांची कथा-कादंबरीची निर्मितीही ठळकपणे नजरेत भरते. जिवंत काडतूस, आबी, खुळंवाडी, बरबाद्याकंजारी (१९६०), चिरानगरची भुतं (१९७८), कृष्णाकाठच्या कथा हे त्यांचे काही कथासंग्रह; त्यांनी पस्तीस कादंबऱ्या लिहिल्या. चित्रा (१९४५) हीत्यांची पहिली कादंबरी. त्यानंतर ३४ कादंबऱ्या त्यांनी लिहिल्या. त्यांत फकिरा (१९५९, आवृ.१६– १९९५), वारणेचा वाघ (१९६८), चिखलातीलकमळ, रानगंगा, माकडीचा माळ (१९६३), वैजयंता ह्यांसारख्या कादंबऱ्यांचा समावेश होतो. त्यांच्या फकिरा ह्या कादंबरीला महाराष्ट्र शासनाचा पुरस्कार मिळाला. वास्तव, आदर्श आणि स्वप्नरंजन यांचे मिश्रण त्या कादंबरीत आहे. सत्प्रवृत्तीचा, माणुसकीचा विजय हे अण्णाभाऊंच्या कादंबऱ्यांचे मुख्यसूत्र होय. त्यांच्या काही कादंबऱ्यांवर चित्रपटही निघाले : वैजयंता (१९६१, कादंबरी वैजयंता ), टिळा लावते मी रक्ताचा (१९६९, कादंबरी आवडी ),डोंगरची मैना (१९६९, कादंबरी माकडीचा माळ ), मुरली मल्हारीरायाची (१९६९, कादंबरी चिखलातील कमळ ), वारणेचा वाघ (१९७०, कादंबरीवारणेचा वाघ ), अशी ही साताऱ्याची तऱ्हा (१९७४, कादंबरी अलगूज ), फकिरा (कादंबरी फकिरा ). या शिवायव इनामदार (१९५८), पेंग्याचं लगीन,सुलतान ही नाटकेही त्यांनी लिहिली.

         उपेक्षित गुन्हेगार म्हणून कलंकित ठरवले गेलेले, दलित आणि श्रमिक यांच्या समृद्घीचे स्वप्न अण्णाभाऊ पाहात आले. डॉ. बाबासाहेब आंबेडकरयांच्या लढाऊ आणि विमोचक विचारांचे संस्कार त्यांच्या मनावर खोलवर झालेले होते. ‘जग बदल घालुनी घाव। सांगूनि गेले मज भीमराव॥’ हे त्यांचे गीतखूप गाजले. त्यांनी लिहिलेल्या लावण्यांत ‘माझी मैना गावावर राहिली’ आणि ‘मुंबईची लावणी’ या अजोड आणि अविस्मरणीय आहेत.

          अतिशय तळमळीने लिहिण्याची त्यांची वृत्ती होती. ‘पृथ्वी शेषाच्या मस्तकावर तरली नसून ती दलितांच्या तळहातावर तरलेली आहे’, असे ते म्हणत; आणि हाच त्यांच्या लेखनाचा प्रेरणा स्रोत होता. मानवी जीवनातील संघर्ष, नाटय, दुःख, दारिद्र्य त्यांच्या साहित्यातून प्रकट होते. त्यांच्या कथा-कादंबऱ्यांतून त्यांनी उभ्या केलेल्या माणसांत जबरदस्त जीवनेच्छा दिसते. त्यांच्यापासून प्रेरणा घेऊन दलित लेखकांची एक प्रतिभावान पिढी निर्माणझाली. त्यात बाबूराव बागूल, नामदेव ढसाळ, लक्ष्मण माने, यशवंत मनोहर, दया पवार, केशव मेश्राम, शरणकुमार लिंबाळे आदींचा अंतर्भाव होतो.

        अण्णाभाऊंची निरीक्षणशक्ती अत्यंत सूक्ष्म आहे. त्यांच्या लेखन शैलीला मराठमोळा, रांगडा पण लोभस घाट आहे. नाट्यमयता हाही त्यांच्यालेखनशैलीचा एक खास गुण. ज्या विपर्यस्त जीवनातून अण्णाभाऊंनी अनुभव आत्मसात केले, त्यांतील क्षणांचा वेग आणि आवेग त्यांच्या लेखनात जाणवतो. लवचिक भावचित्रे अंगासरशा मोडीने साकार करण्याची त्यांची लकबही स्वतंत्र आहे. लेखनावर त्यांनी जीव जडवला होता; त्यांनी ते विपुल केले.

         रशियाच्या ‘इंडो-सोव्हिएत कल्चरल सोसायटी’ च्या निमंत्रणावरून ते १९६१ साली रशियाला गेले. तेथील अनुभवांवर आधारित माझा रशियाचाप्रवास हे प्रवास वर्णन त्यांनी लिहिले.

          पुढे पुढे मात्र दारिद्र्य आणि एकाकी आयुष्य त्यांच्या वाट्याला प्रकर्षाने आले मराठी साहित्यातील प्रतिष्ठितांकडून त्यांची उपेक्षा झाली. विपन्नावस्थेत गोरेगाव (मुंबई) येथे त्यांचे निधन झाले.


महाराष्ट्रातील विद्यापीठांत अण्णाभाऊंवर अकरा प्रबंध प्रसिद्घ केले गेले आहेत. पुणे विद्यापीठात त्यांच्या सन्मानार्थ ‘अण्णाभाऊ साठे’ अध्यासन सुरु करण्यात आले आहे. त्यांच्या कथा-कादंबऱ्यांची केवळ भारतीयच नव्हे, तर २२ परकीय भाषांत भाषांतरे झाली आहेत.


      

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