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स्वामी श्रध्दानंद


                                                                                                                        
               *स्वामी श्रध्दानंद*
      (स्वतंत्रता सेनानी, समाज सुधारक)           
   अन्य नाम : बृहस्पति, मुंशीराम
            *जन्म : 22 फ़रवरी, 1856*
                ( जालंधर, पंजाब)
            *मृत्यु : 23 दिसम्बर, 1926*
               (चाँदनी चौक, दिल्ली)
पिता : लाला नानकचंद
पत्नी : शिवा देवी
संतान : दो पुत्र तथा दो पुत्रियाँ
गुरु स्वामी : दयानन्द सरस्वती
कर्म भूमि : भारत
प्रसिद्धि : समाज सेवक तथा स्वतंत्रता सेनानी
विशेष योगदान : 1901 में स्वामी श्रद्धानन्द ने अंग्रेज़ों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना हरिद्वार में की। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है, जिसका नाम 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' है।
नागरिकता : भारतीय
अन्य जानकारी : स्वामी श्रद्धानन्द ने दलितों की भलाई के कार्य को निडर होकर आगे बढ़ाया, साथ ही कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन का बढ़-चढ़कर नेतृत्व भी किया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक सक्रिय रूप से महत्त्‍‌वपूर्ण भागीदारी की थी।
                  स्वामी श्रद्धानन्द को भारत के प्रसिद्ध महापुरुषों में गिना जाता है। वे ऐसे महान् राष्ट्रभक्त संन्यासियों में अग्रणी थे, जिन्होंने अपना सारा जीवन वैदिक धर्म के प्रचार-प्रसार के लिए समर्पित कर दिया था। स्वामी श्रद्धानंद ने स्वराज्य हासिल करने, देश को अंग्रेज़ों की दासता से छुटकारा दिलाने, दलितों को उनका अधिकार दिलाने और पश्चिमी शिक्षा की जगह वैदिक शिक्षा प्रणाली का प्रबंध करने जैसे अनेक कार्य किए थे। सबसे बड़ी बात यह थी कि वे 18वीं शती में हिन्दुओं और मुस्लिमों के सर्वमान्य नेता थे।
💁🏻‍♂️ *जन्म*
स्वामी श्रद्धानन्द का जन्म 22 फ़रवरी, 1856 ई. को पंजाब प्रान्त के जालंधर ज़िले में तलवान नामक ग्राम में हुआ था। उनके पिता का नाम लाला नानकचन्द था, जो ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा शासित 'यूनाइटेड प्रोविन्स' (वर्तमान उत्तर प्रदेश) में पुलिस अधिकारी के पद पर नियुक्त थे। श्रद्धानन्द जी के बचपन का नाम 'बृहस्पति' रखा गया था, फिर बाद में वे 'मुंशीराम' नाम से भी पुकारे गए। मुंशीराम सरल होने के कारण अधिक प्रचलित हुआ।

📖 *शिक्षा*
मुंशीराम जी के पिता का तबादला अलग-अलग स्थानों पर होता रहता था, जिस कारण मुंशीराम की आरम्भिक शिक्षा अच्छी प्रकार से नहीं हो सकी। लाहौर और जालंधर उनके मुख्य कार्यस्थल रहे। एक बार आर्य समाज के संस्थापक स्वामी दयानन्द सरस्वती वैदिक धर्म के प्रचारार्थ बरेली पहुंचे। पुलिस अधिकारी नानकचन्द अपने पुत्र मुंशीराम को साथ लेकर स्वामी दयानन्द का प्रवचन सुनने पहुंचे। युवावस्था तक मुंशीराम ईश्वर के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते थे। लेकिन स्वामी दयानन्द जी के तर्कों और आशीर्वाद ने मुंशीराम को दृढ़ ईश्वर विश्वासी तथा वैदिक धर्म का अनन्य भक्त बना दिया।

👨‍👩‍👦 *व्यवसाय तथा विवाह*
अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद मुंशीराम एक सफल वकील बने। अपनी वकालत से उन्होंने काफ़ी नाम और प्रसिद्धि प्राप्त की। आर्य समाज में वे बहुत ही सक्रिय रहते थे। उनका विवाह शिवा देवी के साथ हुआ था। मुंशीराम का दाम्पत्य जीवन सुखपूर्वक व्यतीत हो रहा था, लेकिन जब मुंशीराम 35 वर्ष के थे, तभी शिवा देवी स्वर्ग सिधार गईं। उस समय उनके दो पुत्र और दो पुत्रियां थीं। सन् 1917 में उन्होंने संन्यास धारण कर लिया और 'स्वामी श्रद्धानन्द' के नाम से विख्यात हुए।

🔰 *समाज सेवा*
स्वामी श्रद्धानन्द अब दयानन्द सरस्वती के रास्ते पर चल पड़े एवं उनके कामों को पूरा करने का प्रण लिया। अपनी जीवन गाथा में उन्होंने लिखा था- "ऋषिवर! कौन कह सकता है कि तुम्हारे उपदेशों से निकली हुई अग्नि ने संसार में प्रचलित कितने पापों को दग्ध कर दिया है। परंतु अपने विषय में मैं कह सकता हूं कि तुम्हारे सत्संग ने मुझे कैसी गिरी हुई अवस्था से उठाकर सच्चा लाभ करने योग्य बनाया।" स्वामी श्रद्धानन्द अपना आदर्श महर्षि दयानंद को ही मानते थे। महर्षि दयानंद के महाप्रयाण के बाद उन्होंने स्वदेश, स्व-संस्कृति, स्व-समाज, स्व-भाषा, स्व-शिक्षा, नारी कल्याण, दलितोत्थान, स्वदेशी प्रचार, वेदोत्थान, पाखंड खंडन, अंधविश्वास उन्मूलन और धर्मोत्थान के कार्यों को आगे बढ़ाने के कार्य किए।

🛖 *गुरुकुल की स्थापना*
वर्ष 1901 में स्वामी श्रद्धानन्द ने अंग्रेज़ों द्वारा जारी शिक्षा पद्धति के स्थान पर वैदिक धर्म तथा भारतीयता की शिक्षा देने वाले संस्थान "गुरुकुल" की स्थापना की। हरिद्वार के कांगड़ी गांव में 'गुरुकुल विद्यालय' खोला गया। इस समय यह मानद विश्वविद्यालय है, जिसका नाम 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' है। राष्ट्रपिता महात्मा गाँधी उन दिनों अफ़्रीका में संघर्षरत थे। स्वामी श्रद्धानन्द जी ने गुरुकुल के छात्रों से 1500 रुपए एकत्रित कर गाँधीजी के पास भेजे। गाँधीजी जब अफ़्रीका से भारत लौटे तो वे गुरुकुल पहुंचे तथा महात्मा श्रद्धानन्द तथा राष्ट्रभक्त छात्रों के समक्ष नतमस्तक हो उठे। गाँधीजी ने श्रद्धानन्द को महात्मा श्रद्धानन्द कहकर पुकारा।

💥 *स्वाधीनता आंदोलन में सक्रिय*
स्वामी श्रद्धानन्द ने दलितों की भलाई के कार्य को निडर होकर आगे बढ़ाया, साथ ही कांग्रेस के स्वाधीनता आंदोलन का बढ़-चढ़कर नेतृत्व भी किया। कांग्रेस में उन्होंने 1919 से लेकर 1922 तक सक्रिय रूप से महत्त्‍‌वपूर्ण भागीदारी की। 1922 में अंग्रेज़ सरकार ने उन्हें गिरफ्तार किया, लेकिन उनकी गिरफ्तारी कांग्रेस के नेता होने की वजह से नहीं हुई थी, बल्कि वे सिक्खों के धार्मिक अधिकारों की रक्षा के लिए सत्याग्रह करते हुए बंदी बनाये गए थे। स्वामी श्रद्धानन्द कांग्रेस से अलग होने के बाद भी स्वतंत्रता के लिए कार्य लगातार करते रहे। हिन्दू-मुस्लिम एकता के लिए स्वामी जी ने जितने कार्य किए, उस वक्त शायद ही किसी ने अपनी जान जोखिम में डालकर किए हों। वे ऐसे महान् युगचेता महापुरुष थे, जिन्होंने समाज के हर वर्ग में जनचेतना जगाने का कार्य किया।

🌀 *हत्या*
श्रद्धानन्द जी सत्य के पालन पर बहुत जोर देते थे। उन्होंने लिखा है- "प्यारे भाइयो! आओ, दोनों समय नित्य प्रति संध्या करते हुए ईश्वर से प्रार्थना करें और उसकी सत्ता से इस योग्य बनने का यत्‍‌न करें कि हमारे मन, वाणी और कर्म सब सत्य ही हों। सर्वदा सत्य का चिंतन करें। वाणी द्वारा सत्य ही प्रकाशित करें और कमरे में भी सत्य का ही पालन करें। लेकिन सत्य और कर्म के मार्ग पर चलने वाले इस महात्मा की एक व्यक्ति ने 23 दिसम्बर, 1926 को चांदनी चौक, दिल्ली में गोली मारकर हत्या कर दी। इस तरह धर्म, देश, संस्कृति, शिक्षा और दलितों का उत्थान करने वाला यह युगधर्मी महापुरुष सदा के लिए अमर हो गया।
🔮 *महत्त्वपूर्ण तथ्य*
काशी विश्वनाथ मंदिर के कपाट सिर्फ रीवा की रानी के लिए खोलने और साधारण जनता के लिए बंद किए जाने व एक पादरी के व्यभिचार का दृश्य देखकर मुंशीराम जी का धर्म से विश्वास उठ गया था और वे बुरी संगत में पड़ गए थे। किन्तु स्वामी दयानंद सरस्वती के साथ बरेली में हुए सत्संग ने उन्हें जीवन का अनमोल आनंद दिया, जिसे उन्होंने सारे संसार को वितरित किया।
मुंशीराम से स्वामी श्रद्धानन्द तक का सफ़र पूरे विश्व के लिए प्रेरणादायी है। स्वामी दयानंद सरस्वती से हुई एक भेंट और पत्नी के पतिव्रत धर्म तथा निश्छल निष्कपट प्रेम व सेवा भाव ने उनके जीवन को क्या से क्या बना दिया। समाज सुधारक के रूप में उनके जीवन का अवलोकन करें तो पाते हैं कि उन्होंने प्रबल विरोध के बावजूद स्त्री शिक्षा के लिए अग्रणी भूमिका निभाई। स्वयं की बेटी अमृत कला को जब उन्होंने 'ईस-ईसा बोल, तेरा क्या लगेगा मोल' गाते सुना तो घर-घर जाकर चंदा इकट्ठा कर 'गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय' की स्थापना हरिद्वार में कर अपने बेटे हरीश्चंद्र और इंद्र को सबसे पहले भर्ती करवाया। स्वामी जी का विचार था कि जिस समाज और देश में शिक्षक स्वयं चरित्रवान् नहीं होते उसकी दशा अच्छी हो ही नहीं सकती। उनका कहना था कि हमारे यहां शिक्षक हैं, प्रोफ़ेसर हैं, प्रधानाचार्य हैं, उस्ताद हैं, मौलवी हैं, पर आचार्य नहीं हैं। आचार्य अर्थात् आचारवान् व्यक्ति की महती आवश्यकता है।                                          
         

राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज

*🇮🇳 स्वातंत्र्याचा अमृत महोत्सव 🇮🇳*


          *राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज*

        (महाराष्ट्रातील समाजसुधारक,      
    स्वातंत्र्यसेनानी, कवी, गायक)

मूळ नाव : माणिक बंडोजी इंगळे

   *जन्म : ३० एप्रिल, १९०९*
      (यावली, जि. अमरावती)
   *निर्वाण : ११ ऑक्टोबर, १९६८*
       (मोझरी, जि. अमरावती)
गुरू : आडकोजी महाराज
भाषा : मराठी, हिंदी
साहित्यरचना : ग्रामगीता, 
                     अनुभव सागर 
                      भजनावली,   
                      सेवास्वधर्म, 
                      राष्ट्रीय भजनावली
कार्य : अंधश्रद्धा निर्मूलन, 
           जातिभेद निर्मूलन
वडील : बंडोजी
आई : मंजुळाबाई
             तुकडोजी महाराज  यांना राष्ट्रसंत म्हणून ओळखले जाते. अंधश्रद्धा निर्मूलन व जातिभेदाच्या निर्मूलनासाठी त्यांनी भजनांचा आणि कीर्तनाचा प्रभावीपणे वापर केला. आत्मसंयमनाचे विचार त्यांनी ग्रामगीता या काव्यातून मांडले. त्यांनी मराठी व हिंदी भाषांमध्ये काव्यरचना केली आहे. तुकडोजी महाराजांनी १९३५ साली मोझरी येथे गुरुकुंज आश्रमाची स्थापना केली. खंजिरी भजन हा प्रकार त्यांच्या प्रबोधनाचे वैशिष्ट्य होते.
     तुकडोजी महाराज हे आधुनिक काळातील महान संत होते. आडकोजी महाराज हे त्यांचे गुरू. त्यांनी त्यांचे मूळचे माणिक हे नाव त्यांचे गुरू आडकोजी महाराज यांनी बदलून तुकडोजी असे केले. विदर्भात त्यांचा विशेष संचार असला तरी महाराष्ट्राभरच नव्हे तर देशभर हिंडून ते आध्यात्मिक, सामाजिक व राष्ट्रीय एकात्मतेचे प्रबोधन करीत होते. एवढेच नव्हे तर जपानसारख्या देशात जाऊन त्यांनी सर्वांना विश्वबंधुत्वाचा संदेश दिला. सन १९४२ च्या भारत छोडो आंदोलनादरम्यान काही काळ त्यांना अटक झाली होती. "आते है नाथ हमारे" हे त्यांनी रचलेले पद या काळात स्वातंत्र्यलढ्यासाठी स्फूर्तिगान ठरले होते.
        भारत हा खेड्यांचा देश आहे, हे लक्षात घेऊन ग्रामविकास झाला की राष्ट्राचा विकास होईल, अशी तुकडोजी महाराजांची श्रद्धा व विचारसरणी होती. समाजातल्या सर्व घटकांतील लोकांचा उद्धार कसा होईल, याविषयी त्यांनी अहर्निश चिंता केली. ग्रामोन्नती व ग्रामकल्याण हा त्यांच्या विचारसरणीचा जणू केंद्रबिंदूच होता. भारतातील खेड्यांच्या स्थितीची त्यांना पुरेपूर कल्पना होती. त्यामुळे त्यांनी ग्रामविकासाच्या विविध समस्यांचा मूलभूतस्वरूपी विचार केला व त्या समस्या कशा सोडवाव्यात, याविषयी उपाययोजनाही सुचविली. या उपाययोजना त्यांच्या काळाला तर उपकारक ठरल्याच पण त्यानंतरच्या काळालाही उचित ठरल्या. हे आज (त्यांनी आपली जीवनयात्रा संपल्यानंतरच्या काळातही) तीव्रतेने जाणवते. अशा गोष्टींतूनच राष्ट्रसंतांचे द्रष्टेपण दिसून येते.
          अमरावतीजवळ मोझरीच्या गुरुकुंज आश्रमाची स्थापना हे तुकडोजींच्या आयुष्यातील जसे लक्षणीय कार्य आहे, त्याचप्रमाणे ग्रामगीतेचे लेखन हाही त्यांच्या जीवनकार्यातील अत्यंत महत्त्वाचा टप्पा आहे. ग्रामगीता ही जणू तुकडोजी महाराजांच्या वाङ्‌मयसेवेची पूर्तीच होय. स्वत:ला ते तुकड्यादास म्हणत कारण भजन म्हणताना ते जी भिक्षा घेत, त्यावरच आपण बालपणी जीवन कंठिले, ह्याची त्यांना जाणीव होती.
       खेडेगाव स्वयंपूर्ण कसे होईल, याविषयीची जी उपाययोजना तुकडोजी महाराजांनी सुचविली होती, ती अतिशय परिणामकारक ठरली. ग्राम हे सुशिक्षित व्हावे, सुसंस्कृत व्हावे, ग्रामोद्योग संपन्न व्हावेत, गावानेच देशाच्या गरजा भागवाव्यात, ग्रामोद्योगांना प्रोत्साहन मिळा्वे, प्रचारकांच्या रूपाने गावाला नेतृत्व मिळावे, असा त्यांचा प्रयत्‍न होता. त्याचे प्रतिबिंब ग्रामगीतेत उमटले आहे. देवभोळेपणा, जुनाट कालबाह्य अंधश्रद्धा नाहीशा व्हाव्यात, याविषयी त्यांनी अविरत प्रयत्‍न केले.
                    सर्वधर्मसमभाव हेही या राष्ट्रसंताच्या विचारविश्वाचे एक वैशिष्ट्य होते. त्यासाठी तुकडोजी महाराजांनी सामुदायिक/सर्वधर्मीय प्राथनेचा आग्रहपूर्वक पुरस्कार केला.
   तुकडोजी महाराज हे विवेकनिष्ठ जीवनदृष्टीतून एकेश्वरवादाचा पुरस्कार करत असत. धर्मातील अनावश्यक कर्मकांडाला त्यांनी फाटा दिला होता. आयुष्याच्या शेवटापर्यंत त्यांनी आपल्या प्रभावी खंजिरी भजनाच्या माध्यमातून त्यांना अभिप्रेत असलेल्या विचारसरणीचा प्रचार करून आध्यात्मिक, सामाजिक, राष्ट्रीय प्रबोधन केले. स्वातंत्र्याच्या चळवळीत भाग घेतला म्हणून त्यांना कारावासही भोगावा लागला. अखिल भारतीय पातळीवर त्यांनी साधुसंघटनेची स्थापना केली. गुरुकुंज आश्रमाच्या शाखोपशाखा स्थापन करून त्यांनी शिस्तबद्ध सामाजिक कार्यकर्त्यांची एक फळीच निर्माण केली. गुरुकुंजाशी संबंधित असलेले हे सर्व निष्ठावंत कार्यकर्ते आजही त्यांचे हे कार्य अखंडव्रतासारखे चालवीत आहेत.
           महिलोन्नती हाही तुकडोजी महाराजांच्या विचारविश्वाचा एक लक्षणीय पैलू होता. कुटुंबव्यवस्था, समाजव्यवस्था, राष्ट्रव्यवस्था ही स्त्रीवर कशी अवलंबून असते, हे त्यांनी आपल्या कीर्तनांद्वारे समाजाला पटवून दिले. त्यामुळे स्त्रीला अज्ञानात व दास्यात ठेवणे कसे अन्यायकारक आहे, हे त्यांनी अत्यंत प्रभावीपणे पटवून दिले.
               देशातले तरुण हे राष्ट्राचे भावी आधारस्तंभ. ते बलोपासक असावेत म्हणजे ते समाजाचे व राष्ट्राचे संरक्षण करू शकतील. ते नीतिमान व सुसंस्कृतयुक्त कसे होतील, याविषयीचे उपदेशपर व मार्गदर्शनपर लेखन तुकडोजींनी केले. या राष्ट्रसंताने आपल्या लेखनातून व्यसनाधीनतेचा तीव्र निषेध केला.
                   ऐहिक व पारलौकिक यांचा सुंदर समन्वय तुकडोजी महाराजांच्या साहित्यात झाला आहे. त्यांनी मराठीप्रमाणेच हिंदी भाषेतही विपुल लेखन केले. आजही त्यांचे हे साहित्य आपल्याला मार्गदर्शन करीत आहे, यावरून त्यांच्या साहित्यात अक्षर वाङमयाची मूल्ये कशी दडली आहेत, याची सहज कल्पना येईल. राष्ट्रपतिभवनात झालेले त्यांचे खंजिरी भजन ऐकून राष्ट्रपती राजेंद्रप्रसाद यांनी तुकडोजी महाराजांना राष्ट्रसंत म्हणून संबोधिले होते.
                   तुकडोजी महाराजांचे महानिर्वाण आश्विन कृष्ण पंचमी शके १८९० (११ ऑक्टोबर, १९६८) रोजी झाले.
     राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराजांच्या विचारांच्या प्रसिद्धीचे काम अखिल भारतीय श्री गुरुदेव सेवा मंडळाद्वारे केले जाते.

               ग्रामगीता हा त्यांचा ग्राम विकासावरील ग्रंथ प्रसिद्ध आहे. या शिवाय हिंदीतून लिहिलेला लहरकी बरखा हे पुस्तकही प्रसिद्ध आहे. त्यांचे ग्रामगीता ग्रंथामधील विचार सर्व सामान्यापर्यंत पोहचावे याकरिता महाराष्ट्र शासनाने ग्रामगीता हा ग्रंथ पुनर्मुद्रित करून, सवलतीच्या १० रुपये या किंमतीत उपलब्ध करून दिला आहे.

📒 *साहित्य संमेलने*
             तुकडोजी महाराज यांच्या नावाने (१) तुकडोजी महाराज साहित्य संमेलन आणि (२) तुकडोजी महाराज विचार साहित्य संमेलन अशी दोन संमेलने भरतात.
 
📚 *पुस्तके*
            अनुभव सागर भजनावली (कवी - तुकडोजी महाराज)
आठवणी (सचित्र) : राष्ट्रसंत जन्मशताब्दीच्या (गंगाधर श्रीखंडे)
ग्रामगीता (कवी - तुकडोजी महाराज)
डंका तुकाडोजींचा (राजाराम कानतोडे)
राष्ट्रसंत तुकडोजी (बालसाहित्य, लेखक - प्रा. राजेंद्र मुंढे)
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज (चरित्र, लेखक - डॉ. भास्कर गिरधारी)
राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराज मौलिक विचार (संकलन - लेखक - प्रा. राजेंद्र मुंढे). (लोकवाङ्मय प्रकाशन)
राष्ट्रसंताची अमृतधारा : भाग १, २, ३ (तुकडोजी महाराज)
राष्ट्रीय भजनावली (कवी - तुकडोजी महाराज)
लहरकी बरखा (हिंदी)
सेवास्वधर्म (कवी - तुकडोजी महाराज)

📙 *ग्रामगीता*
       ग्रामगीता या ग्रंथात तुकडोजी महाराज म्हणतात :

संत देहाने भिन्न असती। परि ध्येय धोरणाने अभिन्न स्थिती।
साधने जरी नाना दिसती। तरी सिद्धान्तमति सारखी।।

        संत तुकडोजी महाराज यांनी अनेक भजने/कविता लिहिल्या. त्यातीलच ही एक :

या झोपडीत माझ्या
राजास जी महाली, सौख्ये कधी मिळाली
ती सर्व प्राप्त झाली, या झोपडीत माझ्या ॥१॥
भूमीवरी पडावे, ताऱ्यांकडे पहावे
प्रभुनाम नित्य गावे, या झोपडीत माझ्या ॥२॥
पहारे आणि तिजोऱ्या, त्यातूनी होती चोऱ्या
दारास नाही दोऱ्या, या झोपडीत माझ्या ॥३॥
जाता तया महाला, ‘मज्जाव’ शब्द आला
भिती नं यावयाला, या झोपडीत माझ्या ॥४॥
महाली मऊ बिछाने, कंदील शामदाने
आम्हा जमीन माने, या झोपडीत माझ्या ॥५॥
येता तरी सुखे या, जाता तरी सुखे जा
कोणावरी न बोजा, या झोपडीत माझ्या ॥६॥
पाहून सौख्य माझे, देवेंद्र तोही लाजे
शांती सदा विराजे, या झोपडीत माझ्या ॥७॥

       राष्ट्रसंत तुकडोजी महाराजांचे एक भजन. हे भजन जपान येथे झालेल्या विश्वधर्म परिषदेत म्हटले होते.

*हे भजन दिल्ली येथील राजघाटावर नियमीत ऐकविले जाते. :-*
           हर देश में तू ...
हर देश में तू , हर भेष में तू , तेरे नाम अनेक तू एकही है ।
तेरी रंगभुमि यह विश्वभरा, सब खेलमें, मेलमें तु ही तो है ॥टेक॥
सागर से उठा बादल बनके, बादल से फ़टा जल हो कर के ।
फ़िर नहर बनी नदियाँ गहरी,तेरे भिन्न प्रकार तू एकही है ॥१॥
चींटी से भी अणु-परमाणुबना,सब जीव जगत् का रूप लिया ।
कहिं पर्वत वृक्ष विशाल बना, सौंदर्य तेरा,तू एकही है ॥२॥
यह दिव्य दिखाया है जिसने,वह है गुरुदेवकी पूर्ण दया ।
तुकड्या कहे कोई न और दिखा, बस! मै और तू सब एकही है ॥३॥
       
         

🙏🌹 *विनम्र अभिवादन* 🌹🙏
                                                                                                                                                                                                                                                            ➖➖➖➖➖➖➖➖➖                                          
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📡📲 *तंत्रज्ञानाची धरुनी वाट,*
*महाराष्ट्र करू स्मार्ट* 📡📲

तत्त्वज्ञ पांडुरंगशास्त्री आठवले

स्वाध्याय परिवाराचे प्रणेते,संस्थापक,तत्त्वज्ञ पांडुरंगशास्त्री आठवले यांची आज जयंती  (ऑक्टोबर १९ , १९२०- ऑक्टोबर २५, २००३) पांडुरंगशास्त्री आठवलेंचा जन्म ऑक्टोबर १९, १९२० रोजी रोहे या कोकणातील गावी झाला. त्यांचा जन्मदिवस स्वाध्याय परिवार जगभर मनुष्य गौरव दिन म्हणून साजरा करतात. त्यांना रेमन मॅगसेसे, टेंम्पलटेंट पुरस्कार, महात्मा गांधी पुरस्कार, लोकमान्य टिळक पुरस्कार, पद्मविभूषण, अशा विविध पुरस्काराने गौरवण्यात आले.  पारंपारिक शिक्षणाबरोबर 'सरस्वती संस्कृत पाठशाळेत' संस्कृत व्याकरणाबरोबर न्याय, वेदांत, साहित्य, त्याचबरोबर इंग्रजी साहित्याचा अभ्यास पांडूरंगशास्त्री यांनी केला. त्यांना रॉयल ऐशियाटिक सोसायटी मुंबई या संस्थेने सन्माननीय सभासद पद देऊन सन्मानीत केले होते. या ग्रंथालयात त्यांनी कादंबरी विभाग सोडून सर्व मानव्य शाखेतील प्रमुख लेखकांचे, ग्रंथाचे अध्ययन केले.
            द, उपनिषदे, स्मृती, पुराणे यावर चिंतन केले. इ.स.१९९२ मधे त्यांना टिळक पुरस्कार मिळाला तो पुरस्कार देतांना तेव्हाचे राज्यपाल म्हणाले होते ' विद्वत्ता आणि दैवी शक्तीचा संगम झाल्यावरच समाजाचे आणि देशाचे हित सुरक्षीत राहते. पांडुरंग शास्त्री आठवले यांची शिकवण सर्व समाजाने आचरण्यात आणण्याची गरज आहे. पांडुरंगशास्त्री हे आजच्या युगातील दैदीप्यमान आशेचा किरण आहेत   आध्यात्मिक साधनेतून शेतकरी, मच्छिमार, आदिवासी यांच्यापासून शहरी भागांतील सुखवस्तू वर्गापर्यंत सर्व स्तरांमध्यगेल्या चार दशकांहून अधिक काळ समाजपरिवर्तनाची आत्मज्योत फुलविणारे स्वाध्याय परिवाराचे प्रणेते पांडुरंगशास्त्री आठवले यांचे शनिवारी २५ ऑक्टोबर २००३  रोजी गिरगावातील निवासस्थानी हृदयविकाराच्या झटक्याने देहावसान झाले. ते ८४  वर्षांचे होते.  महाराष्ट्र आणि गुजरातेतच नव्हे , तर जगभर पसरलेल्या लक्षावधी स्वाध्यायींना पांडुरंगशास्त्री तथा दादांच्या निधनाचे वृत्त कळताच शोक अनावर झाला. पांडुरंगशास्त्री आठवले यांचे पाथिर्व शनिवारी त्यांच्या ' एड्यूला इमारती ' तील निवासस्थानाहून त्यांची कर्मभूमी ठरलेल्या सी. पी. टँक येथील माधवबागेत नेण्यात आले, तेव्हा तेथे हजारो शोकाकुल स्वाध्यायींनी धाव घेतली. अंत्यदर्शनासाठी सायंकाळी त्यांचे पाथिर्व , ठाणे येथील (दादांनीच स्थापन केलेल्या) तत्त्वज्ञान विद्यापीठाच्या संकुलात ठेवण्यात आले होते. मॅगसेसे , टेम्पल्टन या जागतिक किताबांसह भारतातील पद्मविभूषण व अन्य अनेक पुरस्कारांनी गौरविण्यात आलेल्या पांडुरंगशास्त्री आठवले यांनी जाती-धर्माच्या भिंती भेदणारे असे आध्यात्मिक चिंतन कष्टकरी वर्गापर्यंत पोहोचविण्यावर भर दिला. आठवले यांच्यावर पाच वर्षांपूवीर् बायपास शस्त्रक्रिया झाली होती. त्यांच्या शरीरात पेसमेकरही बसविण्यात आला होता. त्यांना मधुमेहाचा व श्वसनाचाही त्रास होता. त्यामुळे सव्वा वर्षांपासून त्यांनी जाहीर प्रवचनातील सहभाग थांबविला. महिनाभरापूर्वी त्यांना जसलोक रुग्णालयात दाखल करण्यात आले होते. उपचाराअंती ते घरी आले. मात्र शनिवारी दुपारी साडेबारा वाजता अचानक त्यांना हृदयविकाराचा तीव्र झटका आला आणि त्यांची प्राणज्योत मालवली. त्यांच्या पश्चात् त्यांच्या पत्नी निर्मलाताई, कन्या धनश्री तळवलकर तथा दीदी, जावई रावसाहेब तळवलकर आणि लक्षावधी स्वाध्यायी असा परिवार आहे. कोकणात जन्मलेल्या आठवले यांनी १९५८ मध्ये आपल्या कार्याची सुरुवात गुजरातेत सौराष्ट्रामध्ये केली. सुरुवातीला काही गावांमध्ये सुरू झालेली ही चळवळ चार दशकांत अमेरिका , इंग्लंड , आफ्रिकेपर्यंत पसरली. व्यसनमुक्ती , सामाजिक जबाबदारीचे भान , पर्यावरणसंवर्धन आणि स्वकष्टाने आत्मसन्मान जागवून समानता निर्माण करण्याचा मंत्र या सूत्रांवर त्यांच्या स्वाध्याय चळवळीचा पाया उभा राहिला. ' रिलिजस इकॉलॉजिस्ट ' अशा शद्बांतही त्यांचा गौरव काहीवेळा झाला. शेतकरी बंधूंच्या मुलांसाठी त्यांनी सहा कॉलेजे काढली होती. ठाण्यात गुरुकुल पद्धतीने चालणारे तत्त्वज्ञान विद्यापीठ त्यांनी सुरू केले; पण त्याचबरोबर रस्तारुंदीकरणाच्या वेळी त्यांनी तत्त्वज्ञान विद्यापीठाची जागा देऊन रस्त्याच्या कामाचा प्रारंभ केला व समाजाप्रती असलेल्या जबाबदारीचे दर्शन घडविले. आधुनिक युगातील विचारांची दिशा त्यांनी या चळवळीला दिली होती आणि  मच्छिमारांना एका दिवसाचे उत्पन्न आपल्या बांधवांच्या कुटुंबियांसाठी वापरण्याचा ' मत्स्यगंधा ' उपक्रम गेली २०  वषेर् सुरू राहिला. ' योगेश्वर कृषी ' सारख्या उपक्रमातून सामूहिक शेतीचा मंत्र त्यांनी दिला.

महाश्वेता देवी

महाश्वेता देवी


१४ जानेवारी १९२६ - २८ जुलै २०१६)

 २३ एप्रिल रोजी जगभर 'पुस्तक दिन' साजरा होईल. त्या अनुषंगाने ज्येष्ठ भारतीय लेखिका महाश्वेता देवी यांचं स्मरण करणं उचित ठरावं. पद्मविभूषण, ज्ञानपीठ, रेमन मॅगसेसे तसंच सार्क साहित्य पुरस्कार अशा भारतीय आणि जागतिक पुरस्कारांसोबतच त्यांना 'ऑफिसर ऑफ आर्टस् अँड लिटरेचर' हा फ्रान्सचा दुसऱ्या क्रमांकाचा सर्वोच्च नागरी सन्मान प्राप्त झाला. त्यांच्या अतुलनीय साहित्यिक

योगदानाची ही एक पावतीच म्हणायला हवी.

बंगाली लेखिका व विशेषतः आदिवासींसाठी संघर्षात्मक आणि रचनात्मक कार्य करणाऱ्या महाश्वेता देवी यांचा जन्म १४ जानेवारी १९२६ रोजी ढाक्यात झाला. त्यांचे वडील मनीष घटक हे बंगाली लेखक, तर भाऊ ऋत्विक घटक हे सुप्रसिद्ध चित्रपट दिग्दर्शक ! महाश्वेता देवींनी १९४६ मध्ये रवींद्रनाथ टागोर यांनी स्थापन केलेल्या शांतिनिकेतनमधून इंग्रजी विषयात पदवी घेतली. त्यानंतर त्यांनी इंग्रजी साहित्यात विश्वभारती विद्यापीठातून एम.ए. केलं. पुढे इंग्रजीच्या प्राध्यापिका म्हणून महाविद्यालयात त्यांनी नोकरी केली. नोकरी, सामाजिक कार्य आणि आदिवासींच्या हक्कांसाठी संशोधकीय, संघर्षात्मक व

रचनात्मक कार्य करत असतानाच लेखणीशी

असलेली नाळ त्यांनी तुटू दिली नाही. साधारणतः विसाव्या शतकाच्या मध्यात, १९५०-६०च्या दशकात महाश्वेता देवींनी साहित्य लेखनाला सुरुवात केली. वैविध्यपूर्ण आणि भरपूर सकस साहित्य त्यांनी निर्माण केलं. त्यांच्या साहित्याचा अनुवाद अनेक भाषांमध्ये झाला. त्या अथनि त्यांनी बंगालीच नाही, तर भारतभरच्या आणि जगभरच्या विविध भाषिक वाचकांना समृद्ध केलं. पत्रकारिता आणि स्तंभलेखनावरही स्वतःचा स्वतंत्र ठसा त्यांनी उमटवला. जगाकडे बघावं कसं, अभ्यास कसा करावा, संशोधकीय आणि साहित्यिक शैलीत ते मांडावं कसं याचा वस्तुपाठ त्यांनी घालून दिला. भारतीय महिलांच्या साहित्यिक योगदानाला एका उंचीवर नेऊन ठेवण्यात महाश्वेता देवी यांचा महत्त्वपूर्ण आणि अद्वितीय वाटा आहे.

*विठ्ठल सखाराम पागे*


                 *विठ्ठल सखाराम पागे*                                                                  (स्वातंत्र्य सैनिक व रोजगार हमी योजनेचे जनक)                        
          
     *जन्म : 21 जुलै 1910*
    (वाळवा, सांगली, महाराष्ट्र)
      *मृत्यू : 16 मार्च 1990*
 शिक्षण : B.A.LLB                                                   ग्रामीण भागातील ‘रोजगार निर्मिती’ या क्षेत्रात देशातील इतर राज्यांना आदर्शकृत ठरलेल्या महाराष्ट्राच्या रोजगार हमी योजनेचे जनक आणि महाराष्ट्र विधान परिषदेचे सभापतिपद अठरा वर्षे सांभाळणारे ज्येष्ठ गांधीवादी नेते, स्वातंत्र्यसैनिक, तत्त्वचिंतक विठ्ठल सखाराम तथा वि. स. पागे यांचा १६ मार्च हा २० वा स्मृतिदिन. श्री. पागे यांच्या अभ्यासू व्यक्तिमत्त्वाला अनेक पैलू होते.

वकील, समाजसेवक, राजकारणी, लोकप्रतिनिधी, चिंतक, अर्थव्यवस्थेचे अभ्यासक आणि विश्लेषण करून उपाय सुचविणारे प्रशासक अशी त्यांची अनेक रूपे होती. त्याशिवाय संत वाङ्मयाचा आणि संस्कृताचा गाढा अभ्यास हे त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वाचे वेगळेच वैशिष्टय़ होते. अठरा वर्षे विधान परिषदेचे सभापतिपद सांभाळणे आणि तेही कोणत्याही अपवादाचा किंवा प्रवादाचा विषय न होता सांभाळणे ही कामगिरी फार थोडय़ा लोकांना जमू शकते. विशेषत: वै. पागे यांच्या कारकीर्दीत अनेक मातब्बर नेते सभागृहाचे सदस्य होते. विधिमंडळाच्या कामकाजाच्या नियमांचा अतिशय सूक्ष्म अभ्यास करून सरकारला कचाटय़ात पकडणारे जागरूक नेते विरोधी पक्षांमध्ये होते. अशावेळी कै. पागे अतिशय शांतपणे, कायदे आणि नियमांचा अर्थ लावून सुस्पष्ट निर्णय देत, की तो आपोआपच सर्वाना मान्य ठरत असे. परंतु त्यांच्या विधिमंडळातील कारकीर्दीपेक्षाही त्यांची आठवण महाराष्ट्राला व देशाला राहील ती ‘रोजगार हमी योजने’चे जनक म्हणूनच.
‘रोजगार हमी योजनेचा’ कायदा तयार करून सरकारला सादर करून त्यांची अंमलबजावणी करायला लावणे. तिच्या प्रगतीचा आढावा घेणे आणि कालानुरूप तिच्यात बदल सुचविणे ही सारी कामे कै. पागे यांनी केली. एखाद्या राज्याच्या विकासकार्यात इतक्या महत्त्वाच्या प्रश्नासाठी एखाद्या नेत्याने एवढय़ा मोठय़ा प्रमाणावर कार्य केल्याचे दुसरे उदाहरण क्वचितच असेल. अकुशल ग्रामीण बेरोजगारांना स्वत:च्या परिसरामध्ये रोजगार प्राप्त करून देणारी ही योजना कोटय़वधी बेरोजगारांना अक्षरश: वरदानच ठरली आहे. या योजनेमुळे शहरांकडे जाणाऱ्या लोंढय़ांचे स्थलांतराचे प्रमाण नि:संशयपणे कमी झाले आहे. १९६९ साली कै. श्री. पागे यांच्या सांगली जिल्ह्य़ातील विसापूर गावी सदर योजना प्रथम सुरू झाली व नंतर व्यापक प्रमाणावर राबविण्यात आली.
सदर योजनेचा गौरव संयुक्त राष्ट्रसंघात करण्यात आला आहे. काही मागास आफ्रिकन देशांमध्ये ही योजना संयुक्त राष्ट्रसंघातर्फे राबविण्यात येत आहे. पंतप्रधान मनमोहनसिंग यांना त्यांची उपयुक्तता पटली व सदर योजनेबाबत कायदा संसदेमध्ये संमत करून त्यांची देशभर तातडीने अंमलबजावणी करण्यात आली आहे. सदर योजनेमध्ये ग्रामीण बेरोजगारी हटविण्याची क्षमता असल्याने दरवर्षी अंदाजपत्रकामध्ये वाढीव तरतूद भारत सरकारतर्फे करण्यात येत आहे.
महाराष्ट्राला आणि देशाला दिशा दाखविणारे कै. श्री. पागे हे अभ्यासू चिंतक होते. विधिमंडळाबद्दल त्यांनी काही विचार व्यक्त केले आहेत. शैक्षणिक, सांस्कृतिक, समाजकल्याण विषयक बाबी संबंधीची विधेयके विधान परिषदेत मांडून विधानसभेच्या कामाचा व्याप कमी करता येईल असे त्यांनी सुचविले होते.
अध्यात्म, संतवाङमय आणि संसदी परंपरा हे त्यांचे जिव्हाळ्याचे विषय होते. त्यावर बोलताना वि. स. पागे रंगून जात असत. त्यांच्या निवेदनात रसाळपण तर असेच पण या विषयांचा गाढ अभ्यासही जाणवत असे. संस्कृत भाषेचा त्यांचा व्यासंगही दांडगा होता. त्याचे प्रत्यंतर त्यांच्या भाषणांमधून सतत जाणवत असे. त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वाप्रमाणे त्यांच्या भाषेलाही संस्कृतच्या सहवासामुळे एक अभिजात भारदस्तपणा प्राप्त झालेला होता.
कै. वि. स. पागे हे उत्तम दर्जाचे कवी. नाटककार होते. १९३२-३३ च्या सुमारास त्यांनी ‘वीर मोहन’ नावाचे नाटक लिहिले होते. ‘निवडणुकीचा नारळ’ नावाची नाटिका लिहिली होती. त्याचप्रमाणे ‘पहाटेची नौबत’ आणि ‘अमरपक्षी’ या नावाचे त्यांचे दोन काव्यसंग्रह प्रसिद्ध झाले आहेत.
‘तुका म्हणे जाऊ वैकुंठा चालत’ हे त्यांनी लिहिलेले सुंदर संगीत नाटक, ज्येष्ठ अभिनेते दिग्दर्शक कै. श्री. दाजी भाटवडेकर हे या नाटकाचे दिग्दर्शक होते. तसेच संत तुकारामांची प्रमुख भूमिकाही त्यांनीच साकारली होती. सामान्यातून साधुत्वापर्यंतचा संत तुकारामांचा प्रवास सदर नाटकामध्ये सादर केला आहे.
खऱ्या अर्थाने विवेकानंदांच्या कर्मयोग, भक्तियोग आणि ज्ञानयोग यांचा त्रिवेणी संगम जीवनात असलेल्या कै. वि. स. पागे यांची स्मृती जतन करण्यासाठी, त्यांच्या व्यापक व व्यासंगी विचारांचा अभ्यास होण्यासाठी शासनाकडून समाजातील विचारवंतांच्या, अभ्यासकांचा सहकार्यातून योग्य ते स्मारक व्हावे ही अपेक्षा.
                                                                                                                                  
            🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳    
      🙏 *विनम्र अभिवादन*🙏

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          स्त्रोत ~ wikipedia
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नरसिम्हा रेड्डी


                   *नरसिम्हा रेड्डी*  
                   (स्वतंत्रता सेनानी)
पूरा नाम : उय्यलावडा नरसिम्हा रेड्डी
           *जन्म : 24 नवंबर, 1806*
          (उय्यालवडा, ज़िला कुर्नूल, आंध्र प्रदेश)
          *फाँसी : 22 फ़रवरी, 1847*
          ( कोइलकुंटला, ज़िला कुर्नूल, आंध्र प्रदेश)
दादा : जयारामी रेड्डी                           पिता- उय्यलावडा पेडडामल्ला रेड्डी
पत्नी : सिद्दम्मा, पेरम्मा, ओबुलम्मा
नागरिकता : भारतीय
प्रसिद्धि : स्वतंत्रता सेनानी
विशेष योगदान : नरसिम्हा रेड्डी द्वारा बनाए गए किले आज भी उय्यलावडा, रूपनगुड़ी, वेल्ड्रथी और गिद्दलुर जैसे स्थानों पर मौजूद हैं।
          उय्यलावडा नरसिम्हा रेड्डी भारत के प्रथम स्वतंत्रता सेनानी थे। वह पहले देशभक्त थे, जिन्होंने ब्रिटिस शासन के ख़िलाफ़ विद्रोह किया। नरसिम्हा रेड्डी ने वर्ष 1847 में किसानों पर हो रहे अत्याचारों के विरुद्ध आवाज़ उठाई और अंग्रेज़ों से लोहा लिया। उन्हें अल्लागड्डा क्षेत्र से अपने दादा से कर वसूलने की जिम्मेदारी मिली थी। किसानों पर अंग्रेज़ों के जुल्म बढ़ते जा रहे थे। इन्हीं जुल्मों और अत्याचारों के विरुद्ध नरसिम्हा रेड्डी उठ खड़े हुए थे।
💁🏻‍♂️ *परिचय*
नरसिम्हा रेड्डी का जन्म 24 नवंबर, 1806 में उय्यालवडा, जिला कुर्नूल, आंध्र प्रदेश के एक सैन्य परिवार में हुआ था। उनके दादा का नाम जयारामी रेड्डी, पिता का नाम उय्यलावडा पेडडामल्ला रेड्डी था। नरसिम्हा रेड्डी सेना में गवर्नर थे। कदपा, अनंतपुर, बेल्लारी और कुर्नूल जैसे 66 गांवों की कमान उनके हाथ में रहती थी। वह 2000 की सेना को नियंत्रित किया करते थे।

💥 *विद्रोह*
रायलसीमा के क्षेत्र पर ब्रिटिशों के अधिकार करने के बाद नरसिम्हा रेड्डी ने अंग्रेजों के साथ इस क्षेत्र की आय को साझा करने से इनकार कर दिया था। वह एक सशस्त्र विद्रोह के पक्ष में थे। वह युद्ध में गोरिल्ला रणनीति का इस्तेमाल किया करते थे। 10 जून, 1846 को उन्होंने कोइलकुंटला में खजाने पर हमला किया और कंबम (जिला प्रकाशम्) की तरफ प्रस्थान किया। उन्होंने वन रेंजर रूद्राराम को मारकर विद्रोह किया। जिला कलेक्टर ने विद्रोह को बड़ी गंभीरता से लिया और कैप्टन नॉट और वाटसन को नरसिम्हा रेड्डी को पकड़ने का आदेश दिया। वह अपने प्रयास में असफल रहे।

🗣️ *ब्रिटिश सरकार की घोषणा*
ब्रिटिश सरकार ने नरसिम्हा रेड्डी की सूचना देने वाले को 5000 रुपये और उनके सिर के लिए 10000 रुपये देने की घोषणा की, जो उन दिनों में एक बड़ी रकम थी। 23 जुलाई, 1846 को नरसिम्हा रेड्डी ने अपनी सेना के साथ गिद्दलूर में ब्रिटिश सेना के ऊपर आक्रमण कर दिया और उन्हें हरा दिया। नरसिम्हा रेड्डी को पकड़ने के लिए ब्रिटिश सेना ने उनके परिवार को कदपा में बन्दी बना लिया। अपने परिवार को मुक्त करने के प्रयास में वह नल्लामला वन चले गए। जब अंग्रेजों को पता लगा की वह नल्लामला वन में छिपे हैं, तब अंग्रेजों ने अपनी गतिविधियों को और ज्यादा मजबूत कर दिया, जिसके बाद नरसिम्हा रेड्डी कोइलकुंतला क्षेत्र में वापस आ गए और गांव रामबाधुनीपल्ले के पास जगन्नाथ कोंडा में मौके का इंतजार करने लगे।
⛓️ *गिरफ़्तारी*
ब्रिटिश अधिकारियों को उनके कोइलकुंतला के ठिकाने की जानकारी मिली, जिसके बाद ब्रिटिश अधिकारियों ने वह क्षेत्र रातों-रात घेर लिया। 6 अक्टूबर, 1846 को आधी रात के समय उन्हें गिरफ़्तार करके बन्दी बना लिया गया। कोइलकुंतला में उनके पकड़े जाने के बाद उन्हें बुरी तरह से पीटा गया, उनको मोटी-मोटी जंजीरों से बांधा गया था और कोइलकुंतला की सड़कों पर खून से सने हुए कपड़े में ले जाया गया ताकि किसी अन्य व्यक्ति को ब्रिटिश के खिलाफ विद्रोह करने की हिम्मत ना हो सके।

⛓️ *फ़ाँसी*
नरसिम्हा रेड्डी के साथ विद्रोह करने लिए 901 लोगों पर भी आरोप लगाया गया। बाद में उनमें से 412 लोगों को बरी कर दिया गया और 273 लोगों को जमानत पर रिहा किया गया। 112 लोगों को दोषी ठहराया गया। उन्हें 5 से 14 साल के लिए कारावास की सजा सुनाई गई। कुछ को तो अंडमान द्वीप समूह की एक जेल में भेज दिया गया। नरसिम्हा रेड्डी पर हत्या और राजद्रोह करने का आरोप लगाया गया और उन्हें मौत की सजा सुनाई गई। छ: सप्ताह बाद उन्हें सार्वजनिक रूप से जुर्रेती बैंक, कोइलकुंटला, जिला कुर्नूल में सुबह 7 बजे, सोमवार, 22 फ़रवरी, 1847 को फांसी दी गई। उनकी फांसी को देखने के लिए करीब दो हजार लोग उपस्थित थे!
🔮 *विशेष आवरण*
नरसिम्हा रेड्डी द्वारा बनाए गए किले आज भी उय्यलावडा, रूपनगुड़ी, वेल्ड्रथी और गिद्दलुर जैसे स्थानों पर मौजूद हैं। प्रथम स्वतंत्रता सेनानी उय्यालवडा नरसिम्हा रेड्डी की 170वीं पुण्यतिथि मनाने के लिए 22 फ़रवरी, 2017 को उय्यालवडा में एक विशेष आवरण जारी किया गया था।

🎞️ *फ़िल्म*
नरसिम्हा रेड्डी पर बनी फ़िल्म 'सई रा नरसिम्हा रेड्डी'
वर्ष 2019 की तेलुगू फ़िल्म ‘सई रा नरसिम्हा रेड्डी’ स्वतंत्रता सेनानी उय्यालवडा नरसिम्हा रेड्डी के जीवन शैली पर आधारित है। इस फिल्म में चिरंजीवी, अमिताभ बच्चन, नयनतारा, कीचा सुदीप, विजय सेतुपति और जगतपति बाबू की महत्वपूर्ण भूमिकाएं हैं।
           
                                                                                                                                                      

विठ्ठल सखाराम पागे

                 
           
          *विठ्ठल सखाराम पागे*                                                                  (स्वातंत्र्य सैनिक व रोजगार हमी योजनेचे जनक)                        
          
     *जन्म : 21 जुलै 1910*
    (वाळवा, सांगली, महाराष्ट्र)
      *मृत्यू : 16 मार्च 1990*
 शिक्षण : B.A.LLB                                                   ग्रामीण भागातील ‘रोजगार निर्मिती’ या क्षेत्रात देशातील इतर राज्यांना आदर्शकृत ठरलेल्या महाराष्ट्राच्या रोजगार हमी योजनेचे जनक आणि महाराष्ट्र विधान परिषदेचे सभापतिपद अठरा वर्षे सांभाळणारे ज्येष्ठ गांधीवादी नेते, स्वातंत्र्यसैनिक, तत्त्वचिंतक विठ्ठल सखाराम तथा वि. स. पागे यांचा १६ मार्च हा २० वा स्मृतिदिन. श्री. पागे यांच्या अभ्यासू व्यक्तिमत्त्वाला अनेक पैलू होते.

वकील, समाजसेवक, राजकारणी, लोकप्रतिनिधी, चिंतक, अर्थव्यवस्थेचे अभ्यासक आणि विश्लेषण करून उपाय सुचविणारे प्रशासक अशी त्यांची अनेक रूपे होती. त्याशिवाय संत वाङ्मयाचा आणि संस्कृताचा गाढा अभ्यास हे त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वाचे वेगळेच वैशिष्टय़ होते. अठरा वर्षे विधान परिषदेचे सभापतिपद सांभाळणे आणि तेही कोणत्याही अपवादाचा किंवा प्रवादाचा विषय न होता सांभाळणे ही कामगिरी फार थोडय़ा लोकांना जमू शकते. विशेषत: वै. पागे यांच्या कारकीर्दीत अनेक मातब्बर नेते सभागृहाचे सदस्य होते. विधिमंडळाच्या कामकाजाच्या नियमांचा अतिशय सूक्ष्म अभ्यास करून सरकारला कचाटय़ात पकडणारे जागरूक नेते विरोधी पक्षांमध्ये होते. अशावेळी कै. पागे अतिशय शांतपणे, कायदे आणि नियमांचा अर्थ लावून सुस्पष्ट निर्णय देत, की तो आपोआपच सर्वाना मान्य ठरत असे. परंतु त्यांच्या विधिमंडळातील कारकीर्दीपेक्षाही त्यांची आठवण महाराष्ट्राला व देशाला राहील ती ‘रोजगार हमी योजने’चे जनक म्हणूनच.
‘रोजगार हमी योजनेचा’ कायदा तयार करून सरकारला सादर करून त्यांची अंमलबजावणी करायला लावणे. तिच्या प्रगतीचा आढावा घेणे आणि कालानुरूप तिच्यात बदल सुचविणे ही सारी कामे कै. पागे यांनी केली. एखाद्या राज्याच्या विकासकार्यात इतक्या महत्त्वाच्या प्रश्नासाठी एखाद्या नेत्याने एवढय़ा मोठय़ा प्रमाणावर कार्य केल्याचे दुसरे उदाहरण क्वचितच असेल. अकुशल ग्रामीण बेरोजगारांना स्वत:च्या परिसरामध्ये रोजगार प्राप्त करून देणारी ही योजना कोटय़वधी बेरोजगारांना अक्षरश: वरदानच ठरली आहे. या योजनेमुळे शहरांकडे जाणाऱ्या लोंढय़ांचे स्थलांतराचे प्रमाण नि:संशयपणे कमी झाले आहे. १९६९ साली कै. श्री. पागे यांच्या सांगली जिल्ह्य़ातील विसापूर गावी सदर योजना प्रथम सुरू झाली व नंतर व्यापक प्रमाणावर राबविण्यात आली.
सदर योजनेचा गौरव संयुक्त राष्ट्रसंघात करण्यात आला आहे. काही मागास आफ्रिकन देशांमध्ये ही योजना संयुक्त राष्ट्रसंघातर्फे राबविण्यात येत आहे. पंतप्रधान मनमोहनसिंग यांना त्यांची उपयुक्तता पटली व सदर योजनेबाबत कायदा संसदेमध्ये संमत करून त्यांची देशभर तातडीने अंमलबजावणी करण्यात आली आहे. सदर योजनेमध्ये ग्रामीण बेरोजगारी हटविण्याची क्षमता असल्याने दरवर्षी अंदाजपत्रकामध्ये वाढीव तरतूद भारत सरकारतर्फे करण्यात येत आहे.
महाराष्ट्राला आणि देशाला दिशा दाखविणारे कै. श्री. पागे हे अभ्यासू चिंतक होते. विधिमंडळाबद्दल त्यांनी काही विचार व्यक्त केले आहेत. शैक्षणिक, सांस्कृतिक, समाजकल्याण विषयक बाबी संबंधीची विधेयके विधान परिषदेत मांडून विधानसभेच्या कामाचा व्याप कमी करता येईल असे त्यांनी सुचविले होते.
अध्यात्म, संतवाङमय आणि संसदी परंपरा हे त्यांचे जिव्हाळ्याचे विषय होते. त्यावर बोलताना वि. स. पागे रंगून जात असत. त्यांच्या निवेदनात रसाळपण तर असेच पण या विषयांचा गाढ अभ्यासही जाणवत असे. संस्कृत भाषेचा त्यांचा व्यासंगही दांडगा होता. त्याचे प्रत्यंतर त्यांच्या भाषणांमधून सतत जाणवत असे. त्यांच्या व्यक्तिमत्त्वाप्रमाणे त्यांच्या भाषेलाही संस्कृतच्या सहवासामुळे एक अभिजात भारदस्तपणा प्राप्त झालेला होता.
कै. वि. स. पागे हे उत्तम दर्जाचे कवी. नाटककार होते. १९३२-३३ च्या सुमारास त्यांनी ‘वीर मोहन’ नावाचे नाटक लिहिले होते. ‘निवडणुकीचा नारळ’ नावाची नाटिका लिहिली होती. त्याचप्रमाणे ‘पहाटेची नौबत’ आणि ‘अमरपक्षी’ या नावाचे त्यांचे दोन काव्यसंग्रह प्रसिद्ध झाले आहेत.
‘तुका म्हणे जाऊ वैकुंठा चालत’ हे त्यांनी लिहिलेले सुंदर संगीत नाटक, ज्येष्ठ अभिनेते दिग्दर्शक कै. श्री. दाजी भाटवडेकर हे या नाटकाचे दिग्दर्शक होते. तसेच संत तुकारामांची प्रमुख भूमिकाही त्यांनीच साकारली होती. सामान्यातून साधुत्वापर्यंतचा संत तुकारामांचा प्रवास सदर नाटकामध्ये सादर केला आहे.
खऱ्या अर्थाने विवेकानंदांच्या कर्मयोग, भक्तियोग आणि ज्ञानयोग यांचा त्रिवेणी संगम जीवनात असलेल्या कै. वि. स. पागे यांची स्मृती जतन करण्यासाठी, त्यांच्या व्यापक व व्यासंगी विचारांचा अभ्यास होण्यासाठी शासनाकडून समाजातील विचारवंतांच्या, अभ्यासकांचा सहकार्यातून योग्य ते स्मारक व्हावे ही अपेक्षा.
                                                                                                                                  
            🇮🇳 *जयहिंद* 🇮🇳