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समाजकारण /राजकारण

भास्कर पांडुरंग कर्णिक...

  


                  *हुतात्मा*

       *भास्कर पांडुरंग कर्णिक*

          (भारतीय क्रांतिकारक)


    *जन्म : ७ डिसेंबर १९१३*

    (करूळ, रत्‍नागिरी, महाराष्ट्र )

 *मृत्यू : ३० जानेवारी, १९४३*

            (पुणे, महाराष्ट्र) 


📖 *शिक्षण*

                          त्यांचे प्राथमिक शिक्षण करूळ गावी, तर माध्यमिक शिक्षण गुलबर्गा येथे झाले. त्यांनी मुंबई विद्यापीठातून त्यांनी बी.एस्‌सी. केले आणि १९४२ साली ते पुण्याजवळच्या देहूरोड येथील ॲम्युनिशन फॅक्टरीत नोकरीस लागले.


💣 *अर्धा ट्रक बॉम्ब*

                           देहूरोड येथील एच. डेपोमध्ये असताना भास्कर कर्णिक यांनी तेथून बॉम्ब पळवायला सुरुवात केली. बाजूला काढून ठेवलेल्या बॉम्बच्या खोक्यांतला एक बॉम्ब रोज जेवणाच्या डब्यातून बाहेर आणला जाई. अश्या पद्धतीने कर्णिक यांच्याकडे अर्धा ट्रक भरेल एवढे बॉम्ब जमा झाले होते. या बॉम्बपैकी काही बॉम्ब पुढे पुणे कॅन्टॉन्मेन्टमधील कॅपिटॉल चित्रपटगृहात टाकण्यात आले. बॉम्ब टाकण्याच्या कटात सामील असलेले बापू साळवी, बाबूराव चव्हाण, एस.टी. कुलकर्णी, रामसिंग, दत्ता जोशी आणि हरिभाऊ लिमये असे सहा जण जेलमध्ये गेले, पैकी दत्ता जोशी जेलमध्येच वारले, बाकीचे काही काळानंतर सुटले.


⏳ *फरासखान्यात मृत्यू*

                             कॅपिटॉलमध्ये सापडलेल्या बॉम्बच्या अवशेषांवरून हे बॉम्ब कोठून आले याचा पोलिसांनी शोध घेतला, आणि त्यांनी भास्कर पांडुरंग कर्णिक, भालचंद्र दामोदर बेंद्रे, अनंत आगाशे, वामन कुलकर्णी आणि रामचंद्र तेलंग या पाच जणांना पकडून पुण्याच्या फरासखाना पोलीस चौकीत आणले. आणल्यानंतर कर्णिक लघुशंकेच्या निमित्ताने किंचित दूर गेले आणि त्यांनी खिशातली सायनाईडची पूड खाल्ली. त्यांचे निधन झाले. त्यांच्या या कृत्यामुळे कर्णिकांकडून मोठी माहिती मिळेल असे वाटणार्‍या पोलिसांची निराशा झाली. कर्णिकांच्या बलिदानामुळे मोठ्या संख्येने क्रांतिकारक वाचले.


💣 *हुतात्मा भास्कर पांडुरंग कर्णिक*

             ‘कॅपिटल व वेस्टएंड’ ही पुण्यातील दोन सिनेमागृहे होती. तिथे गोरे अधिकारी परिवारासह सिनेमा पहायला जात. कॅपिटल म्हणजे आजचे VICTORY सिनेमागृहात प्रचंड बॉम्बस्फोट झाला. त्यात चार युरोपियन्स ठार झाले व १४ जण जखमी झाले. त्यावेळी हॅमंड व रोच या गोऱ्या अधिकाऱ्यांची माथी भडकली. दारूगोळा कुठून आला? बॉम्ब कसे बनवले? याबाबत हैराण झाले. त्यानंतर अनेकांची धरपकड झाली.

प्रथम हाती लागला तो आगाशे नावाचा तरूण. त्याच्याकडून जोगेश्वरीच्या देवळाचे पुजारी भालचंद्र बेंद्रे यांचे नाव समजले. मध्यरात्रीनंतर देवळाला वेढा देऊन झोपेत असताना बेंद्रेंना पकडले. तर दुसऱ्या दिवशी जंगली महाराजांच्या देवळासमोरील जज्ज पाटील यांच्या घरात भाड्याने राहणाऱ्या भास्कर पांडुरंग कर्णिक नावाच्या तरूणाला पोलिसांनी ताब्यात घेतले. पिस्तुल रोखून उलट सुलट तपासणी केली. खोलीची झडती घेतली असता खॉटखाली ढिगभर बॉम्ब सापडले. हॅन्ड ग्रेनेड्स बनवायची स्फोटके सापडली.

त्यानंतर भास्कर कर्णिकला हॅमंडचे फरासखान्यात मुसक्या बांधून आणले व पोलिसांना इशारा दिला. बाहेर केसरीचे वार्ताहर वि. स. माडीवाले व सकाळचे भि. न. ठाकोर बातम्या मिळविण्यासाठी आले होते. त्यांनी भास्करला पोलिसांच्या गराड्यात पाहिले. भास्कर शांतपणे म्हणाला, साहेब तुम्ही मला पकडलेच आहे. आता मी काय लपवणार? तुम्हाला मी माझ्या सहकाऱ्यांची सर्व नावे सांगतो, पण मला खूप लघवीला लागली आहे. जरा जाऊन येतो. पोलिसांनी खुश होऊन परवानगी दिली. पुढेमागे पोलीस ठेवून भास्कर कर्णिक यांना शौचालयात जाऊ दिले. त्याने दार लोटून घेतले आणि १० मिनिटातच बाहेर आला आणि फरासखान्याच्या पहिल्या चौकाच्या अलिकडे धाडकन खाली कोसळला. काय झाले कुणालाच कळेना. पोलीसही चक्रावून गेले.

हॅमंड साहेबांनी तातडीने डॉ. जेजुरीकरांना बोलावून भास्करला तपासायला लावले. पण भास्करचे प्राण कधीच गेले होते. हॅमंडच्या अमानुष मारहाणीपुढे कदाचित आपला टिकाव लागला नाही आणि चुकूनसुद्धा आपल्या सहकाऱ्यांची नावे तोंडातून जाऊ नयेत यासाठी हुतात्मा भास्कर कर्णिक याने योजना आखून ठेवली होती.

त्याने पोटॅशियम सायनाईटच्या जहाल विषाची कुपी मुद्दाम वाढवलेल्या नखामध्ये लपवून ठेवली होती. लघवीच्या निमित्ताने शौचालयात जाऊन ते विष पिऊन टाकले आणि पोलिसांच्या कचाट्यातून आणि पुढील लढ्यासाठी आपल्या इतर सहकाऱ्यांची सुटका केली. ३० जानेवारी १९४३ रोजी भास्कर पांडुरंग कर्णिक याने हौतात्म्य पत्करले.

        

अरविन्द अक्रोध्य घोष

                                                                        

             *अरविन्द अक्रोध्य घोष*

(भारतीय राजनीतिज्ञ, दार्शनिक, योग गुरु और गुरु)

               *जन्म : 15 अगस्त 1872*

             (कलकत्ता, ब्रिटिश भारत)

              *मृत्यु : 5 दिसम्बर 1950*

                   (पाण्डिचेरी)

अरविन्द घोष या श्री अरविन्द एक योगी एवं दार्शनिक थे। वे १५ अगस्त १८७२ को कलकत्ता में जन्मे थे। इनके पिता एक डाक्टर थे। इन्होंने युवा अवस्था में स्वतन्त्रता संग्राम में क्रान्तिकारी के रूप में भाग लिया, किन्तु बाद में यह एक योगी बन गये और इन्होंने पांडिचेरी में एक आश्रम स्थापित किया। वेद, उपनिषद ग्रन्थों आदि पर टीका लिखी। योग साधना पर मौलिक ग्रन्थ लिखे। उनका पूरे विश्व में दर्शन शास्त्र पर बहुत प्रभाव रहा है और उनकी साधना पद्धति के अनुयायी सब देशों में पाये जाते हैं। यह कवि भी थे और गुरु भी।

               

साहित्यिक कार्य : दिव्य जीवन, द मदर, लेटर्स आन् योगा, सावित्री, योग समन्वय, फ्यूचर पोयट्री

धर्म : हिन्दू

दर्शन : हिन्दुत्व

📖 *प्रारम्भिक शिक्षा*

अरविन्द के पिता डॉक्टर कृष्णधन घोष उन्हें उच्च शिक्षा दिला कर उच्च सरकारी पद दिलाना चाहते थे, अतएव मात्र ७ वर्ष की उम्र में ही उन्होंने इन्हें इंग्लैण्ड भेज दिया। उन्होंने केवल १८ वर्ष की आयु में ही आई. सी. एस. की परीक्षा उत्तीर्ण कर ली थी। इसके साथ ही उन्होंने अंग्रेजी, जर्मन, फ्रेंच, ग्रीक एवं इटैलियन भाषाओँ में भी निपुणता प्राप्त की थी।


👱‍♂️ *युवावस्था*

देशभक्ति से प्रेरित इस युवा ने जानबूझ कर घुड़सवारी की परीक्षा देने से इनकार कर दिया और राष्ट्र-सेवा करने की ठान ली। इनकी प्रतिभा से बड़ौदा नरेश अत्यधिक प्रभावित थे अत: उन्होंने इन्हें अपनी रियासत में शिक्षा शास्त्री के रूप में नियुक्त कर लिया। बडौदा में ये प्राध्यापक, वाइस प्रिंसिपल, निजी सचिव आदि कार्य योग्यता पूर्वक करते रहे और इस दौरान हजारों छात्रों को चरित्रवान देशभक्त बनाया।1896 से 1905 तक उन्होंने बड़ौदा रियासत में राजस्व अधिकारी से लेकर बड़ौदा काॅलेज के फ्रेंच अध्यापक और उपाचार्य रहने तक रियासत की सेना में क्रान्तिकारियों को प्रशिक्षण भी दिलाया था। हजारों युवकों को उन्होंने क्रान्ति की दीक्षा दी थी।


वे निजी रुपये-पैसे का हिसाब नहीं रखते थे परन्तु राजस्व विभाग में कार्य करते समय उन्होंने जो विश्व की प्रथम आर्थिक विकास योजना बनायी उसका कार्यान्वयन करके बड़ौदा राज्य देशी रियासतों में अन्यतम बन गया था। महाराजा मुम्बई की वार्षिक औद्योगिक प्रदर्शनी के उद्धाटन हेतु आमन्त्रित किये जाने लगे थे।

लार्ड कर्जन के बंग-भंग की योजना रखने पर सारा देश तिलमिला उठा। बंगाल में इसके विरोध के लिये जब उग्र आन्दोलन हुआ तो अरविन्द घोष ने इसमे सक्रिय रूप से भाग लिया। नेशनल लाॅ कॉलेज की स्थापना में भी इनका महत्वपूर्ण योगदान रहा। मात्र ७५ रुपये मासिक पर इन्होंने वहाँ अध्यापन-कार्य किया। पैसे की जरूरत होने के बावजूद उन्होंने कठिनाई का मार्ग चुना। अरविन्द कलकत्ता आये तो राजा सुबोध मलिक की अट्टालिका में ठहराये गये। पर जन-साधारण को मिलने में संकोच होता था। अत: वे सभी को विस्मित करते हुए 19/8 छक्कू खानसामा गली में आ गये। उन्होंने किशोरगंज (वर्तमान में बंगलादेश में) में स्वदेशी आन्दोलन प्रारम्भ कर दिया। अब वे केवल धोती, कुर्ता और चादर ही पहनते थे। उसके बाद उन्होंने राष्ट्रीय विद्यालय से भी अलग होकर अग्निवर्षी पत्रिका बन्दे मातरम् (पत्रिका) का प्रकाशन प्रारम्भ किया।

ब्रिटिश सरकार इनके क्रन्तिकारी विचारों और कार्यों से अत्यधिक आतंकित थी अत: २ मई १९०८ को चालीस युवकों के साथ उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। इतिहास में इसे 'अलीपुर षडयन्त्र केस' के नाम से जानते हैं। उन्हें एक वर्ष तक अलीपुर जेल में कैद रखा गया।| अलीपुर जेल में ही उन्हें हिन्दू धर्म एवं हिन्दू-राष्ट्र विषयक अद्भुत आध्यात्मिक अनुभूति हुई। इस षड़यन्त्र में अरविन्द को शामिल करने के लिये सरकार की ओर से जो गवाह तैयार किया था उसकी एक दिन जेल में ही हत्या कर दी गयी। घोष के पक्ष में प्रसिद्ध बैरिस्टर चितरंजन दास ने मुकदमे की पैरवी की थी। उन्होने अपने प्रबल तर्कों के आधार पर अरविन्द को सारे अभियोगों से मुक्त घोषित करा दिया। इससे सम्बन्धित अदालती फैसले ६ मई १९०९ को जनता के सामने आये। ३० मई १९०९ को उत्तरपाड़ा में एक संवर्धन सभा की गयी वहाँ अरविन्द का एक प्रभावशाली व्याख्यान हुआ जो इतिहास में उत्तरपाड़ा अभिभाषण के नाम से प्रसिद्ध हुआ। उन्होंने अपने इस अभिभाषण में धर्म एवं राष्ट्र विषयक कारावास-अनुभूति का विशद विवेचन करते हुए कहा था।


जब मुझे आप लोगों के द्वारा आपकी सभा में कुछ कहने के लिए कहा गया तो में आज एक विषय हिन्दू धर्म पर कहूँगा। मुझे नहीं पता कि मैं अपना आशय पूर्ण कर पाउँगा या नहीं। जब में यहाँ बैठा था तो मेरे मन में आया कि मुझे आपसे बात करनी चाहिए। एक शब्द पूरे भारत से कहना चाहिये। यही शब्द मुझसे सबसे पहले जेल में कहा गया और अब यह आपको कहने के लिये मैं जेल से बाहर आया हूँ।

एक साल हो गया है मुझे यहाँ आए हुए। पिछली बार आया था तो यहाँ राष्ट्रीयता के बड़े-बड़े प्रवर्तक मेरे साथ बैठे थे। यह तो वह सब था जो एकान्त से बाहर आया जिसे ईश्वर ने भेजा था ताकि जेल के एकान्त में वह इश्वर के शब्दों को सुन सके। यह तो वह ईश्वर ही था जिसके कारण आप यहाँ हजारों की संख्या में आये। अब वह बहुत दूर है हजारों मील दूर।

🧔🏻‍♂ *प्रमुख शिष्य*

चम्पकलाल, नलिनि कान्त गुप्त, कैखुसरो दादाभाई सेठना, निरोदबरन, पवित्र, एम पी पण्डित, प्रणब, सतप्रेम, इन्द्र सेन

📚 *कृतियाँ*

द मदर

लेटर्स ऑन योगा

सावित्री

योग समन्वय

दिव्य जीवन

फ्यूचर पोयट्री

योगिक साधन

"वंदे मातरम"

कारा काहिनी (जेलकथा)

धर्म ओ जातीयता (धर्म और राष्ट्रीयता)

अरबिन्देर पत्र (अरविन्द के पत्र)     

                                           

         

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